काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशूलचिकित्साध्यायः १८] खिलस्थानम् ५३१
तैलं शुक्तं मस्तु सौवीरकं च पिबेच्छूली सह सौवर्चलेन ।
वातिकशूल से पीडित रोगी को चाहिये कि वह हरिण, जांगल पशु-पक्षी तथा लाव का लवणयुक्त मांंसरस, स्निग्ध, उष्ण एवं अम्ल पदार्थ, वातघ्न ओषधियों से सिद्ध किया हुआ दूध तथा सौवर्चल लवणयुक्त तैल, शुक्त (सिरका), मस्तु तथा सौवीरक (जौ तथा गेहूँ से बनी हुई कांजी) का सेवन करे ॥
श्यामां शुण्ठीं सैन्धवं तुम्बुरूणि हिङ्गु क्षारं यावशूकं विडं च ।।१०।। श्लक्ष्णं पिष्ट्वा प्रवराह्नं शटि च पेयं कोष्णं चाम्भसा वातशूले ।
वातिक शूल में श्यामा (त्रिवृत्), सोंठ, सैन्धव, तुम्बुरु (नेपाली धनिया अथवा तेजबल), हींग, क्षार (सर्जक्षार), यवक्षार, विडलवण, प्रवर (अगरु) तथा शटी (कचूर-कपूर-कचरी)—इन्हें बारीक पीसकर गर्म करके जल के साथ सेवन करना चाहिये ॥१०॥
क्षीरं पीत्वा शीतलं पित्तशूली वमेत् कामं शर्करावारिणा वा ।।११।। शूलार्तं वा शङ्खकुन्देन्दुगौरैर्मुक्ताहारैः संस्पृशेत् पङ्कजैर्वा । रौप्यैः कांस्यैः स्फाटिकैः काञ्चनैर्वा (तोया) सिक्तैर्भाजनैश्चन्द्रशीतैः ।।१२।। यस्मिञ्छूलं संस्पृशेत्तं प्रदेशं भूयो भूयः कदलीनां दलैर्वा । मृद्धीं शय्यां विसिनीपत्रभक्तिन्यासोपेतां चन्दनाम्बुप्रसिक्ताम् ।।१३।। शीते वेश्मन्यहतां सोपधानां सेवेतान्तःप्रस्फुरत्पद्मपत्राम् ।
पैत्तिक शूल के रोगी को शीतल दूध पीकर अथवा पानी में खाण्ड मिलाकर उसका सेवन करके यथेच्छ वमन कर देना चाहिये । उस शूल से पीडित व्यक्ति के शरीर का शंख, कुन्द तथा चन्द्रमा के समान श्वेत कमल की मालाओं के द्वारा तथा चन्द्रमा के द्वारा अथवा चन्द्रमा के समान शीतल (अथवा चन्द्र-कर्पूर डालकर शीतल किये हुए), चांदी, कांसी, स्फटिक तथा सोने के जलपूर्ण पात्रों का स्पर्श कराना चाहिये । अथवा जिस स्थान पर शूल हो उसे बार २ कदलीदलों (केले के पत्तों) के द्वारा स्पर्श कराना चाहिये । उस रोगी को शीतल घर में मृदु, विसिनी (मृणाल) पत्र से युक्त, चन्दन के अर्क से सींची हुई, उपधान (तकिये) से युक्त बिना टूटी हुई तथा जिसमें पद्मपत्र विकसित हों ऐसी शय्या का प्रयोग करना चाहिये ॥११-१३॥
हृद्याः शीता मधुरा भेदनीयाः पेयाः सिद्धाः शीतला वा कषायाः ।।१४।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २४४ तमं पत्रम् ।)
क्षौद्रोन्मिश्राः स्वादवः पित्तशूलस्योच्छेदार्थं शर्कराचूर्णयुक्ताः ।
तथा पित्त शूल को नष्ट करने के लिये रोगी को मधु एवं शर्करा चूर्ण मिश्रित स्वादु, हृद्य, शीतल, मधु तथा विरेचन गुणयुक्त सिद्ध की हुई पेया अथवा शीतल कषाय का प्रयोग करना चाहिये ॥१४॥
सामे सोत्क्लेशे भोजने वा विदग्धे संशुद्ध्यर्थं सैन्धवोष्णोदकेन ।।१५।। कुर्यात् कामं वमनं श्लेष्मशूले वान्तं चैनं लङ्घितं सुप्रतान्तम् । क्षारोपेतं पाययेत् पाचनीयं पिप्पल्यादिक्राथमुष्णं सहिङ्गु ।।१६।। तत्सिद्धां वा भोजयेत्तं यवागूं संसृष्टान्नः क्रमश्रो वा निषेवेत् । चूर्णं सपिर्वटकक्षारबस्तीन् कल्कक्वाथान् भागशः कल्पशश्च ।।१७।।