काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 892, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें५३२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | शूलचिकित्साध्यायः १८]
श्लैष्मिक शूल में आम रस का उत्क्लेश होने पर अथवा भोजन के विदग्ध होने पर संशोधन के लिये लवणयुक्त गरम पानी से यथेच्छ वमन कराये। वमन के बाद उसे लङ्घन कराकर क्षार मिलाकर कोई पाचन योग पिलाये, गरम २ पिप्पल्यादि क्वाथ में हींग मिलाकर देवे अथवा इसी क्वाथ से सिद्ध की हुई यवागू खिलाये या संसर्जन क्रम से भोजन कराये। इसके अतिरिक्त चूर्ण, सर्पि, वटक, क्षार, बस्ति, कल्क तथा क्वाथ का योग्य परिमाण एवं कल्प के अनुसार प्रयोग करना चाहिये ॥१५-१७॥
शूलाटोपानाहगुल्मामयघ्नं सिद्धं प्रोक्तमृषिभिर्ध्यानयोगात् ॥१८।।
हिङ्गुपाठात्रिकटुकक्षारसैन्धवचित्रकान् । हपुषामभयां चव्यमजाजीधान्यपुष्करान् ।।१९।।
अम्लवेतसवृक्षाम्लयवानीदाडिमानि च । शटिं सौवर्चलं चैव सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत् ।।२०।।
एतद्धि चूर्णमुष्णाम्बुदधिमस्तुसुरासवैः । पीतमानाहहृद्वस्तिशूलगुल्मार्तिनाशनम् ।।२१।।
ऋषियों ने ध्यान (समाधि) के बल से शूल, आटोप, आनाह तथा गुल्म रोगों को नष्ट करने वाला निम्न सिद्ध योग कहा है—हींग, पाठा, त्रिकटु, सर्जक्षार, सैन्धव, चित्रक, हाऊबेर, हरड़, चव्य, अजाजी (अजवायन), धनिया, पुष्करमूल, अम्लवेत, वृक्षाम्ल (तिन्तिडीक–विषांविल), यवानी, अनारदाना, कपूर कचरी, सौवर्चल, इन सबका सूक्ष्म चूर्ण कर ले। यह चूर्ण उष्णजल, दधिमस्तु, सुरा एवं आसव से सेवन करने पर आनाह, हृच्छूल, बस्तिशूल तथा गुल्म रोग को नष्ट करता है ॥१८-२१॥
प्लीहाशोग्रहणीदोषकासश्वासानुरोग्रहम् । मातुलुङ्गरसैर्युक्तं हन्ति मूत्रग्रहं तथा ।।२२।।
उपर्युक्त चूर्ण को ही यदि बिजौरे नीम्बू के रस से सेवन किया जाय तो वह प्लीहावृद्धि, अर्श, ग्रहणी विकार, कास, श्वास, उरोग्रह तथा मूत्रग्रह को नष्ट करता है ॥२२॥
अम्लवेतसवृक्षाम्लयवानीक्षारचित्रकम् । हिङ्गुचव्योषकशटीजीवन्तीत्रिकंटूनि च ।।२३।।
पिप्पलीं पिप्पलीमूलं बदरं शिरिवारिकम् । नागदन्तीं च बिल्वं च तथा लवणपञ्चकम् ।।२४।।
समभागानि मतिमान् सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत् । रसेन मातुलुङ्गस्य वटकान् कारयेत्ततः ।।२५।।
गुल्मोदावर्त्तशूलेषु पिबेदेतान्महागुणान् । सुखोष्णवारिमद्याम्लैर्मूत्रकृच्छ्रे तथैव च ।।२६।।
हृद्रोगेषु गुदभ्रंशमेढ्रबस्तिरुजासु च।
अम्लवेतस, वृक्षाम्ल (तिन्तिडीक-विषांबिल), अजवायन, सर्जक्षार, चित्रक, हींग, चव्य, ऊषक (मृत्तिका क्षार अथवा टंकण क्षार-सुहागा), कपूर कचरी, जीवन्ती, त्रिकटु, पिप्पली, पिप्पलीमूल, बेर, शिरिवारिका (चांगेरी), नागदन्ती (स्थूलमूल दन्ती), बिल्व, पांचो नमक (सौवर्चल, सैन्धव, विड, उद्भिद्, सामुद्र) ये सब समभाग लेकर सूक्ष्म चूर्ण करे। मातुलुङ्ग के रस से इनकी गोलियां बनाये। ईषदुष्ण जल, मद्य तथा अम्ल (कांजी) के अनुपान से इनका गुल्म, उदावर्त्त, शूल, मूत्रकृच्छ्र, हृद्रोग, गुदभ्रंश, मेढ्रशूल तथा बस्तिशूल में प्रयोग करना चाहिये ॥२३-२६॥
विडदाडिमहिङ्गूनि सैन्धवं मरिचं तथा ।।२७।।
मातुलुङ्गरसैर्युक्तं शूलाटोपहरं पिबेत्।
विड नमक, अनारदाना, हींग, सैन्धव तथा मरिच को मातुलुङ्ग के रसमें मिलाकर पीने से शूल तथा आटोप (पेट में वायु के कारण होने वाली गड़गड़ाहट) शान्त होते हैं ॥२७॥
एतानि व्योषपृथ्वीकाचव्यचित्रकसैन्धवैः ।।२८।।
साजाजिपिप्पलीमूलयुतैर्वा पथ्यमुत्तमम् ।