भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 893, कुल 942 में से

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पृष्ठ 893

शूलचिकित्साध्यायः १८] खिलस्थानम् ५३३

उपर्युक्त योग, त्रिकटु, पृथ्वीका (जीरा या बड़ी इलायची), चव्य, चित्रक, सैन्धव, अजाजी (कालाजीरा) तथा पिप्पलीमूल के साथ सेवन करने से उत्तम पथ्य है ॥२८॥

सौवर्चलवचाहिङ्गुत्र्यूषणं सहरीत कम् ॥२९॥ सुरेशयवसंयुक्तं हन्ति शूलबलं क्षणात्।

सौवर्चल, बच, हींग, त्रिकटु, हरड़ तथा इन्द्रजौ का चूर्ण क्षण भर में ही शूल के वेग को नष्ट कर देता है ॥२९॥

पलिकान् घृतसंयुक्तान् सक्तुसैन्धवचित्रकान् ॥३०॥ वचां चैवैकतः कृत्वा कटाह प्रदहेद्भिषक् । प्रदीप्तमवतार्याथ तं क्षारं मात्रया पिबेत् ॥३१॥ तण्डुलोदकसंयुक्तं शूलगुल्मरुजापहम् ।

वैद्य सत्तू, सैन्धव, चित्रक तथा बच-प्रत्येक १ पल का सूक्ष्म चूर्ण करके कढाई में डालकर जलाये। अत्यन्त प्रदीप्त होने पर उसे उतार ले। इस क्षार का उचित मात्रा में तण्डुलोदक के साथ सेवन करने से शूल तथा गुल्म रोग नष्ट होते हैं ॥३०-३१॥

पञ्चमूलयवक्वाथयुक्तमेरण्डजं पिबेत् ॥३२॥

उपर्युक्त प्रयोजन के लिये ही पञ्चमूल तथा जौ के क्वाथ के साथ एरण्ड के क्षार का प्रयोग करना चाहिये ॥३२॥

तैलं वात्वात्मके शूले द्राक्षाक्वाथयुतं तथा। सशर्करं पित्तशूले पित्तगुल्मे प्लीहेषु च ॥३३॥

वातिक शूल में द्राक्षा के क्वाथ के साथ तथा पैत्तिक शूल, पैत्तिक गुल्म तथा प्लीहारोग में शर्करा के साथ तिलतैल का प्रयोग करना चाहिये ॥३३॥

दाडिमव्योषहपुषापृथ्वीकाक्षारचित्रकैः । साजाजिपिप्पलीमूलचव्यदीप्यकसैन्धवैः ॥३४॥ समांशैर्विपचेत् सर्पिः सक्षीरं मृदुनाऽग्निना । कोलमूलकयूषेण संयुक्तं वातगुल्मनुत् ॥३५॥ शूलानाहश्वासकासविषमज्वरहद्ग्रहान् । अरुचिग्रहणीदोषशूलपाण्ड्वामयांस्तथा ॥३६॥ योनिदोषांश्च हन्येतदमृतप्रतिमं घृतम् ।

अनार दाना, त्रिकटु, हाऊबेर, पृथ्वीका (बड़ी इलायची), सर्जक्षार, चित्रक, अजाजी (कालाजीरा), पिप्पलीमूल, चव्य, दीप्यक (यमानी-अजमोद), सैन्धव-समभाग लेकर थोड़े दूध के साथ मृदु अग्नि पर घृत पाक करे। यह घृत बेर तथा मूली के यूष के साथ मिलाकर सेवन करने से वातगुल्म को नष्ट करता है। तथा अमृत के समान यह घृत शूल, आनाह, श्वास, कास, विषमज्वर, हृद्ग्रह, अरुचि, ग्रहणी विकार, शूल, पाण्डुरोग तथा योनिदोषों को नष्ट करता है ॥३४-३६॥

बिल्वकुष्ठयवक्षारवचाचित्रकसैन्धवैः । ॥३७॥ एणीयकविडव्योषतिन्तिडीकाम्लवेतसैः । हिङ्गुसौवर्चलाजाजि(शि)दाडिमेन्द्रयवैस्तथा ॥३८॥ पुनर्नवाकारवीभ्यां हंसपद्या च साधितम् । घृतं चतुर्गुणे क्षीरे शुक्तकाञ्जि(जि)कसंयुतम् ॥३९॥ द्विप्रस्थमूलकीलानां कुलत्थानां रसेन च । शूलगुल्मानिलोन्मादहृत्प्लीहार्तिहृद्ग्रहान् ॥४०॥ वातकुण्डलिकाशूलघ्नं सर्पिरपोहति ।

बिल्व, कुष्ठ, यवक्षार, बच, चित्रक, सैन्धव, एणीयक (?), विड लवण, त्रिकटु, तिन्तिडीक (चिञ्चाम्ल), अम्लवेतस, हींग, सौवर्चल, अजाजी, अनारदाना, इन्द्रजौ, पुनर्नवा, कारवी (कालाजीरा) तथा हंसपदी के चूर्ण से घृत

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