काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५३४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शूलचिकित्साध्यायः १८]
डालकर उसमें घृत से चतुर्गुण दही, शुक्त (सिरका), कांजी और दोनों पञ्चमूल (अर्थात् दशमूल), कोल तथा कुलत्थ का रस डालकर घृतपाक विधि से घृत सिद्ध करें। इस घृत के सेवन से शूल, गुल्म, वातकम्प, ग्रन्थिरोग, अर्दित, हृद्ग्रह, वातकुण्डलिका (मूत्राघात रोग) तथा आवर्त (भ्रम) रोग नष्ट होते हैं ॥
सौवर्चलयवक्षारवचात्र्यूषणचित्रकैः ।।४१।।
हरीतकीविडङ्गाभ्यां पयसा चैव साधितम्।
(इति ताडपत्रपुस्तके २४५ तमं पत्रम्।)
संयुक्तं भद्ररोहिण्या दशाङ्गं शूलनुद् घृतम् ।।४२।।
प्लीहगुल्मकृमिश्वासकासहिक्काविनाशनम् ।
सौवर्चल, यवक्षार, बच, त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पीपल), चित्रक, हरड़, विडङ्ग तथा भद्ररोहिणी इन दस द्रव्यों से दूध डालकर घृतपाक विधि से घृत सिद्ध करें। यह घृत शूल, प्लीहा, गुल्म, कृमि, श्वास, कास तथा हिक्का को नष्ट करता है ॥
शतपुष्पावचाकुष्ठपिप्पलीफलसैन्धवैः ।।४३।।
सर्षपद्वयसंयुक्तां फलवति प्रयोजयेत् । एषाऽऽध्मानमुदावर्तं शूलं चाशु व्यपोहति ।।४४।।
उष्णोदकस्नेहयुक्तं मूत्रक्षौद्राम्लकाञ्जिकैः । संयोज्यैकत्र मतिमानेभिश्चूर्णैः समावपेत् ।।४५।।
सौंफ, बच, कुष्ठ, पिप्पली, मैनफल, सैन्धव तथा सफेद और पीली सरसों के चूर्ण को एकत्र पीसकर उष्णजल, स्नेह (तैल), गोमूत्र, मधु, खटाई तथा कांजी के साथ मिलाकर फलवर्ति¹ (गुदवर्ती–Suppository) बनाये। इसके प्रयोग से आध्मान, उदावर्त तथा शूल आदि शीघ्र नष्ट होते हैं ॥४३-४५॥
शताह्वापिप्पलीकुष्ठवचानां देवदारुणः । पूतीकस्य हरेणूनां बिल्वानां मदनस्य च ।।४६।।
शूलानाहविबन्धघ्नमिमं बस्तिं प्रदापयेत् । आस्थापनप्रमाणेने स्निग्धस्विन्नस्य देहिनः ।।४७।।
संरुद्धे वायुना मूत्रे प्रतिस्तब्धे तथोदरे । पुरीषे च विमार्गस्थे चूर्णबस्तिरयं हितः ।।४८।।
स्नेहन एवं स्वेदन करने के बाद रोगी को आस्थापन बस्ति के प्रमाण के अनुसार शताह्वा (सोया), पिप्पली, कुष्ठ, बच, देवदारु, पूतीक (करञ्ज), हरेणु, बिल्व तथा मैनफल के चूर्ण की बनाई हुई बस्ति देनी चाहिये। यह शूल, आनाह तथा विबन्ध (मलबन्ध) को नष्ट करती है। यह चूर्ण बस्ति (उपर्युक्त चूर्णों के द्वारा बनाई हुई बस्ति) वायु के द्वारा मूत्र के रुक जाने, पेट के स्तब्ध होने तथा पुरीष (मल) के विपरीत मार्ग में चले जाने पर हितकारी होती है ॥४६-४८॥
वारिद्रोणे पलान्यष्टौ पचेद्गन्धपलाशकात् । ततः कषायं तु वचापिप्पलीफलसैन्धवैः ।।४९।।
संयुक्तं क्षौद्रतैलाभ्यां शताह्वाकुडवेन च । दद्यान्निरूहमानाहपार्श्वहृद्बस्तिशूलिनाम् ।।५०।।
एक द्रोण जल में ८ पल गन्धपलाश (गन्धशटी–कपूरकचरी) को पकाकर कषाय बनाये। उस कषाय में बच, पिप्पली, मैनफल, सैन्धव, मधु, तैल तथा सोया एक कुडव डाले। आनाह, पार्श्वशूल, हृच्छूल तथा बस्तिशूल के रोगियों को यह निरूह (आस्थापन) बस्ति देवे ॥४९-५०॥
१. घृताभ्यक्ते गुदे क्षिप्ता श्लक्ष्णा स्वाङ्गुष्ठसन्निभा। मलप्रवर्तिनी वर्तिः फलवर्त्तिश्च सा स्मृता ॥