भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 895

शूलचिकित्साध्यायः १८] खिलस्थानम् ५३५

बलवर्णाग्निजननं श्रोणिगुल्मरुजापहम्। कुलत्थयवकोलानि पञ्चमूलद्वयं तथा ।। ५१ ।।
क्वाथयेत्तं जलद्रोणे ततस्तं तैलसंयुतम्।

कुलत्थ, यव, कोल तथा दोनों पञ्चमूल को एक द्रोण जल में पकाकर क्वाथ बनाये। इस क्वाथ में तैल मिलाकर बस्ति के रूप में प्रयोग करने से बल, वर्ण तथा जाठराग्नि की वृद्धि होती है तथा श्रोणि और गुल्म रोग नष्ट होते हैं ॥५१॥

कषायं पिप्पलीकुष्ठवचेन्द्रयवसर्षपैः ।। ५२ ।।
हरेणुकासैन्धवाभ्यां तगरेण घृतेन वा। तन्निरूहमुदावर्तकुष्ठगुल्मोपशान्तये ।। ५३ ।।
दद्याच्चैवेदममाश्वेव बलवर्णाग्निवर्धनम्। तैलपक्वाशनं धीरः कल्कपेष्यैर्विपाचितम् ।। ५४ ।।

पिप्पली, कुष्ठ, बच, इन्द्रजौ, सरसों, हरेणु, सैन्धव, तगर तथा घृत की निरूह (आस्थापन) बस्ति देने से उदावर्त, कुष्ठ तथा गुल्मरोग शान्त होते हैं। उपर्युक्त द्रव्यों के कल्क को पीसकर तथा तैल में पकाकर प्रयोग करने से शीघ्र ही बल, वर्ण तथा जाठराग्नि की वृद्धि होती है ॥५२-५४॥

पिप्पलीबिल्वमधुकशताह्वाफलचित्रकैः। देवदारुवचाकुष्ठपुष्कराख्यैश्च संयुतम् ।। ५५ ।।
समांशैर्द्विगुणक्षीरं तदुदावर्तिनां हितम्। शूलानाहगुदभ्रंशवर्चोमूत्रविनिग्रहान् ।। ५६ ।।
कट्यूरुपृष्ठशूलार्शोमूढवातांश्च नाशयेत्। गुदशूलं तथोत्थानं बहुशः सप्रवाहिकम् ।। ५७ ।।

पिप्पली, बिल्व, मुलहठी, शताह्वा, मैनफल, चित्रक, देवदारु, बच, कुष्ठ तथा पुष्करमूल-सब समभाग लेकर इसमें द्विगुण दूध मिलाकर क्षीरपाक करें। यह योग उदावर्त के रोगियों को हितकर है। इसके प्रयोग से शूल, आनाह, गुदभ्रंश, वर्चोग्रह (मलबन्ध), मूत्रग्रह (मूत्र का रुक जाना), कटिशूल, ऊरुशूल, पृष्ठशूल, अर्श, मूढवात (वायु का न सरना), गुदशूल, उत्थान (मलरोग) तथा प्रवाहिका (Dysentry) रोग नष्ट होते हैं ॥५५-५७॥

कुष्ठं विडङ्गातिविषादारुदार्वाहरेणुकाः। एलाऽजमोदा हीबेरं नागरं पुष्करं शटी ।। ५८ ।।
स्थिरा सकट्फला रास्ना पिप्पल्यश्चव्यचित्रकम्।
श्यामा शताह्वा यष्ट्याह्वा सैन्धवं मदनं वचा ।। ५९ ।।
निचुलं नीलिनी दन्ती बिल्वं चाक्षार्धसंन्नि(मि)तैः। गन्धवतैलं तैलं वा पचेत्तदनुवासनम् ।। ६० ।।
गुल्माढ्यवातशूलार्शःप्लीहोदावर्तवृद्धिनुत्। सकुण्डलं मूत्रकृच्छ्रमानाहं च व्यपोहति ।। ६१ ।।

कुष्ठ, विडङ्ग, अतीस, देवदारु, दारुहल्दी, हरेणु, एला, अजमोद, हीबेर (बालक), सोंठ, पुष्करमूल, कपूरकचरी, स्थिरा (सालपर्णी), कायफल, रास्ना, पिप्पली, चव्य, चित्रक, श्यामा (त्रिवृत्), शताह्वा, मुलहठी, सैन्धव, मैनफल, बच, निचुल (जलवेतस), नील, दन्ती, बिल्व-सब आधा २ अक्ष (१/२ तोला) लेवें। इनके कल्क के द्वारा एरण्ड अथवा तिल का तेल पकायें। इस तैल का अनुवासन (स्नेहबस्ति) करने से गुल्म, आढ्यवात¹ (वातरक्त), शूल, अर्श, प्लीहा, उदावर्त, वृद्धि, कुण्डल, मूत्रकृच्छ्र तथा आनाहरोग नष्ट होते हैं॥

शतार्धं दशमूलस्य मदनानां तथाऽऽढकम्। पूतीकदन्तीसुरभीश्वदंष्ट्राणां च बुद्धिमान् ।। ६२ ।।
पलानि विंशतिं दद्यादेकैकस्य तमेकतः। यवकोलकुलत्थानां प्रस्थयुक्तं जलोन्मने ।। ६३ ।।
क्वाथयेत् पादशेषं तु तस्मिंस्तैलाढकं पचेत्। गोमूत्रार्धाढकं यवपिप्पलीसैन्धवत्रिकम् ।। ६४ ।।


१. चलः स्निग्धे मृदुः शीते शोफोऽङ्गेषु मृदुस्तथा। आढ्यवात इति ज्ञेयः सकृच्छ्रो मेदसावृतः॥
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