काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 896, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें५३६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अष्टज्वरचिकित्सितोत्तराध्यायः १९]
........ यवशताह्नानां ......... वलीनकैः । कुष्ठवक्र(क्र)स्य(त्व)चा युक्तमेतत् स्यादनुवासनम् ।। ६५ ।।
ऊरुस्तम्भकटीपृष्ठगुदवंक्षणशूलिषु । प्लीहोदावर्तगुल्मेषु फलतैलं प्रयोजयेत् ।। ६६ ।।
फलतैल— दशमूल-५० पल। मैनफल-१ आढक। पूतीक (करञ्ज), दन्ती, सुरभी (रास्ना) तथा गोखुरू-प्रत्येक २० पल। यव, कोल, कुलत्थ-१ प्रस्त। इन सबको एक उन्मन (द्रोण) जल में पकाकर क्वाथ करे। चतुर्थांश शेष रहने पर उसमें एक आढक तैल डालकर सिद्ध करे। फिर उसमें आधा आढक गोमूत्र तथा यव, पिप्पली, तीनो लवण (विड, सैन्धव तथा रुचक), .... यव, शताह्वा, .... वलीनक कुष्ठ तथा वक्र (तगर या पित्त पापड़ा) की छाल डालकर पकाये। यह उत्तम अनुवासन है। इस फल तैल का ऊरुस्तम्भ, कटीशूल, पृष्ठशूल, गुदशूल, वंक्षणशूल, प्लीहा, उदाहवर्त तथा गुल्मरोग में प्रयोग करना चाहिये ।।६२-६६।।
इति शूलचिकित्सा ते विस्तरेण प्रकीर्तिता । सिद्धैः प्रयोगैर्विविधैः प्राणिनां हितकाम्यया ।। ६७ ।।
इस प्रकार मैंने तुझे प्राणियों के हित की दृष्टि से नाना प्रकार के सिद्ध योगों द्वारा विस्तारपूर्वक शूलचिकित्सा का उपदेश किया है ।। ६७ ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। चू १ (७१)
(इति) खिलेषु शूलचिकित्साध्यायोऽष्टादशः ।। १८ ।। डाड (१८)।
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। चू १ (७१)
(इति) खिलेषु शूलचिकित्साध्यायोऽष्टादशः ।। १८ ।। डाड (१८)।
अथाष्टज्वरचिकित्सितोत्तराध्याय एकोनविंशतितमः ।
अथातोऽष्टज्वरचिकित्सितोत्तरमध्यायं व्याख्यास्यामः ।। १ ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। २ ।।
अब हम अष्ट ज्वर चिकित्सितोत्तर नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।। १-२ ।।
एकद्वित्रिसमुत्थानां निदानं प्रागुदाहृतम् । चिकित्सां संप्रवक्ष्यामि सन्निपातस्य हेतुवत् ।। ३ ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २४६ त१मं पत्रम्)
मैंने एकदोषज (वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक), द्विदोषज (वातपैत्तिक, वातश्लैष्मिक, पित्तश्लैष्मिक) तथा त्रिदोषज (सान्निपातिक-वातपित्तकफ तीनों दोषों से होने वाले) ज्वरों का निदान पहले बता दिया है। अब मैं उन सबकी चिकित्सा तथा सन्निपात ज्वर का निदान कहूंगा ।। ३ ।।
१. अस्याग्रे पत्रत्रयं लुप्तं ताडपत्रपुस्तके।