काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टज्वरचिकित्सितोत्तराध्यायः १९] खिलस्थानम् ५३७
अहिता ............................................. । ............................ गुडसंयुतः ।।
इस श्लोक में संभवतः ज्वर का निदान दिया गया है। अर्थात् अहितकर आहार ....... तथा गुड के सेवन आदि से ज्वर हो जाता है।।
बिल्वोऽग्निमन्थः श्योनाकः काश्मर्यः पाटलिस्तथा एषां तु मूलं निष्क्वाथ्य पिबेत् सक्षारसैन्धवम् ।।
बिल्व, अग्निमन्थ, श्योनाक (अरलू), गंभारी तथा पाढल–इन सबकी मूल का क्वाथ बनाकर उसमें सर्जक्षार तथा सैन्धव मिलाकर वातज्वर के रोगी को पिलाना चाहिये।
समङ्गी मधुकं मुस्तं भद्रदार्वाथ शर्करा। वातज्वरे प्रयोक्तव्यं गुडूच्या सह पानकम् ।।
मंजीठ, मुलहठी, नागरमोथा, देवदारु शर्करा तथा गिलोय का पानक (शर्बत–Syrup) बनाकर वातज्वर में प्रयोग करना चाहिये।।
विदारिगन्धा ह्येरण्डं बृहत्यौ पृश्निपर्णिका। भद्रदारुसमायुक्तो वातज्वरहरो मतः ।।
विदारीगन्धा, एरण्ड, दोनों बृहती, पृश्निपर्णी तथा देवदारु–इन सबका वातज्वर में प्रयोग करना चाहिये।।
विदारिगन्धा कलशी तथा गन्धर्वहस्तकः। मधुकं भद्रदारुश्च क्वाथः शर्करया युतः ।।
वातज्वरहरो देयो मातुलुङ्गरसाप्लुतः।
विदारीगन्धा, कलशी (पृश्निपर्णी), गन्धर्वहस्तक (एरण्ड), मुलहठी तथा देवदारु के क्वाथ में शर्करा और मातुलुङ्ग का रस मिलाकर वातज्वर में देना चाहिये।।
एरण्डं वरुणं चैव बृहत्यौ मधुकं तथा ।।
वातज्वरहरः क्वाथो रास्नाकल्कसमायुतः।
एरण्ड, वरुण, दोनों बृहती (स्थूल तथा क्षुद्र बृहती) तथा मुलहठी के क्वाथ में रास्ना का कल्क मिलाकर देने से वातज्वर नष्ट होता है।।
द्विपञ्चमूलनिष्क्वाथः कोष्णो वा यदि वा हिमः ।
रास्नाकल्कसमायुक्तो वातज्वरहितो मतः ।।
दोनों पञ्चमूल (अर्थात् दशमूल) के ईषद् उष्ण अथवा शीतल क्वाथ में रास्ना का कल्क मिलाकर वातज्वर में हितकर माना गया है।
रास्नासरलदेवाव्हयष्टीमधुकसंयुतः। पेयो विदारिगन्ध्याद्यो निष्क्वाथो वा ससैन्धवः ।।
रास्ना, सरल (चीड़), देवदारु तथा मुलहठी से युक्त विदारीगन्धादि के क्वाथ में सैन्धव मिलाकर पीना चाहिये।।
पञ्चमुष्टिकयूषेण युक्ताम्ललवणेन च। भुञ्जीत भोजनं काले जाङ्गलानां रसेन च ।।
पिबेदन्तरपानं च बिल्वमूलशृतं जलम् ।
योग्य मात्रा में खटाई तथा लवण मिले हुए पञ्चमुष्टिक यूष अथवा जांगल पशु–पक्षियों के मांxrस के साथ योग्य काल में भोजन करना चाहिये। तथा भोजन के बीच में बिल्वमूल से सिद्ध किया हुआ जल देना चाहिये। पञ्चमुष्टिक यूष—इसका पहले खिलस्थान के शोथ चिकित्सिताध्याय में वर्णन किया गया है। इसे वहीं देखें (श्लोक सं. ३०) ।।
द्वे पञ्चमूले वर्चीवमेकेषीकां पुनर्नवाम् ।।