काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५३८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अष्टज्वरचिकित्सितोत्तराध्यायः १९]
सहस्त्रवीर्यां नादेयीं शतवीर्यां शतावरीम् । विश्वदेवां शुकनसां सहदेवां सनाकुलीम् ।। रास्नाजगन्धे पूतीकं देवाह्वं देवताडकम् । बले द्वे हंसपदीं च क्वाथोत्थीमुपलङ्कषाम् (?) ।। कृष्णागरुं व्याघ्रनखं शतपुष्पां पलङ्कषाम् । कायस्थां च वयस्थां च चोरकं जटिलां जटाम् । अपेतराक्षसीं यक्षां गुहाह्वामुष्ट्रलोमिकाम् । हरेणुकां हैमवतीं कैटर्यं सुवहां वचाम् ।। वृश्चिकालीं च भार्गीं च ..... स्या शिग्रुं च कल्कशः । संहृत्य तैलं विपचेद्वातज्वरनिबर्हणम् ।। पुराणसर्पिःसंस्कारो विधेयो जाङ्गलो रसः।
दोनों पञ्चमूल (अर्थात् दशमूल), वर्चीव, एकेषीका (पाठा), पुनर्नवा, सहस्त्रवीर्या (दूर्वा), नादेयी (अरणी अथवा नागरमोथा), शतवीर्या (शतमूली अथवा द्राक्षा), शतावरी, विश्वदेवा (गोरक्षतण्डुला), शुकनासा (श्योनाक), सहदेवा (बला), गन्धनाकुली, रास्ना, अजगन्धा (वन्यवानी-जंगली अजवायन), पूतीक (करञ्ज), देवदारु, देवताड़क (देवदाली-घोषालता), दोनों बला (बला तथा अतिबाला), हंसपदी, किसी क्वाथ विशेष में शोधित गूगल, काला अगर, व्याघ्रनख (नखनखी) सौंफ, गूलर, कायस्था (आंवला अथवा काकोली), वयस्था (हरड़), चोरक (ग्रन्थिपर्णी का एक भेद-भटेउर), जटिला (वटवृक्ष), जटा (जटामांसी), अपेतराक्षसी (काली तुलसी), यक्षा (राल), गुहाह्वा (पृश्निपर्णी का भेद), उष्ट्रलोमिका, हैमवती (स्वर्णक्षीरी अथवा हरीतकी), कैटर्य (महानिम्ब का एक भेद गोरानीम), सुवहा (शेफालिका), बच, वृश्चिकाली (बरहण्टा), भारंगी .... तथा सुहांजने का कल्क बनाकर तैल पाक करे । यह वातज्वर को नष्ट करता है । इसमें पुराने घृत के संस्कार से युक्त जांगल मांसरस का प्रयोग करना चाहिये ।।
दशमूलकुलत्थानां यवानां कुडवस्य च ।। कुलीरशृङ्ग्या रास्नायाः शटीपुष्करमूलयोः । भार्ग्या दुरालभायाश्च निर्यूहः साधु साधितः ।। तेनास्य विगुणो वायुर्ज्वरश्चाशु प्रशाम्यति ।
दशमूल, कुलत्थ, यव, कुलीरशृंगी (काकड़ाशृंगी), रास्ना, कपूरकचरी, पुष्करमूल, भारंगी तथा दुरालभा-एक २ पल लेकर उनका अच्छी प्रकार निर्यूह (क्वाथ) बनाया जाये । इस प्रयोग से विगुण (दूषित) हुआ वायु तथा ज्वर शीघ्र ही शान्त हो जाते हैं ।।
वातश्लेष्मसमुत्थस्य व्याख्यास्यामि चिकित्सतम् ।। बृहत्यौ पुष्करं दारु पिप्पल्यो नागरं शटी । क्वाथमेषां पिबेदुष्णामादौ दोषविपाचनम् ।।
अब मैं वातश्लेष्म ज्वर की चिकित्सा का उपदेश करूंगा । वातश्लेष्म ज्वर के प्रारंभ में दोनों बृहती (स्थूलफला तथा क्षुद्रफला), पुष्करमूल, देवदारु, पिप्पली, सोंठ, कपूरकचरी का क्वाथ पीना चाहिये । यह दोषों का पाचन करता है ।।
द्विपञ्चमूलं भार्गीं च कर्कटाख्यां दुरालभाम् । नागरं पिप्पलीं दारु पिबेद्वा सैन्धवान्वितम् ।।
अथवा इसमें दोनों पञ्चमूल, भारंगी, काकड़ाशृंगी, दुरालभा, सोंठ, पिप्पली तथा देवदारु के क्वाथ में सैन्धव मिलाकर पीना चाहिये ।।
पटोलं धान्यकं मुस्ता मूर्वा पाठा निदिग्धिका । कषाय एषां पातव्यः षडङ्गो मधुसंयुतः ।।
पटोल, धनिया, नागरमोथा, मूर्वा (मोरबेल), पाठा, निदिग्धिका (कण्टकारी)-इन ६ द्रव्यों के कषाय में मधु मिलाकर सेवन करना चाहिये ।।
त्रिफला जीवनीयानि पिप्पलीमूलशर्करे । सिद्धो ग्रहह्नसंयुक्तो वातश्लेष्मज्वरापहः ।।