काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपानीयगुणविशेषीयाध्यायः २३] खिलस्थानम् ५५१
.................................... । ............ निष्क्वाथोष्णाम्बु पाचनम् ।।
श्रमे भेदेषु तृष्णासु मूर्च्छास्वतिपिपासिते । निष्क्वाथलाघवादम्बु सलिलं तप्तशीतलम् ।।
निर्दिशेत् सर्वदोषघ्नं बालानां ........................... ।
उष्ण जल के गुण—क्वाथ बनाकर गरम किया हुआ जल पाचक होता है । क्वाथ बनाने के कारण लघु हुआ यह जल श्रम, भेद (मलभेद-अतिसार), तृष्णा, मूर्च्छा तथा अत्यन्त पिपासा में उपयोगी है । गरम करके ठण्डा किया हुआ यह जल बालकों के सब रोगों को नष्ट करने वाला कहा गया है । सुश्रुत सू. अ. ४५ में कहा है—कफमेदोऽनिलामघ्नं दीपनं बस्तिशोधनम् । श्वासकासज्वरहरं पथ्यमुष्णोदकं सदा ।। यहां उष्ण किये हुए अथवा क्वाथ बनाकर तैयार किये हुए हुए जल का क्या अभिप्राय है-इसको भी आचार्य स्वयं वहीं स्पष्ट करते हैं कि—जो जल क्वाथ बनाने के कारण हल्का हो गया हो तथा चतुर्थांश शेष रहा हो-वही गुणकारी होता है ।।२४-२५।।
......................................................... ।।
.............. मुष्णोदकं शिशोः । रक्तपित्तामयं त्यक्त्वा प्रायो वातकफात्मके ।।
रोगे शिशुर्वा धात्री वा गुर्विणी वोष्णकं पिबेत् । क्वचिद्रोगविशेषेण तप्तशीतं हितं बहु ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २६१ तमं पत्रम् ।)
रक्तपित्त रोग को छोड़कर प्रायः सब वात एवं कफ के रोगों में शिशु को उष्ण जल का प्रयोग कराना चाहिये । शिशु, धात्री तथा गर्भिणी स्त्री को उष्ण जल का ही प्रयोग कराना चाहिये । किसी २ रोग में गरम करके ठण्डा किया हुआ जल अधिक हितकर माना गया है । ऐसा सुश्रुत सू. अ. ४५ में कहा है । रक्तपित्त रोग में उष्ण जल का निषेध किया गया है क्योंकि उष्णता से रक्तपित्त प्रकुपित हो जाता है ।।
अथान्तरिक्षं शरदि प्रशस्तं संतप्यमानं च रवेर्मयूखैः ।
पिबेत्सरो वाऽथ नदीं तडागं हेमन्तकाले शिशिरे च बालः ।।
वाप्यौद्भिदं प्रास्रवणं हि तोयं ग्रीष्मे प्रशस्तं कुसुमागमे च ।
वर्षासु कौपं सलिलं प्रशस्तमारोग्यहेतोरथ तप्तशीतलम् ।।
बालकों के लिये शरद् ऋतु में सूर्य की किरणों से सन्तप्त (तपाया हुआ) हुआ आन्तरीक्ष जल (वर्षा जल) प्रशस्त माना गया है । हेमन्त तथा शिशिर ऋतु में सरोवर, नदी तथा तडाग (तालाब) का जल पीना चाहिये । ग्रीष्म तथा वसन्त ऋतु में बाबड़ी, औद्भिद अथवा झरने का जल प्रयोग में लाना चाहिये । तथा वर्षा ऋतु में गरम करके ठण्डा किया हुआ कुंए का पानी आरोग्य के लिये हितकर होता है ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
(इति) खिलेषु पानीयगुणविशेषीयाध्यायः ।। (२३)
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।
(इति) खिलेषु पानीयगुणविशेषीयाध्यायः ।। (२३)