काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५५२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | मांसगुणविशेषीयाध्यायः २४]
अथ मांसगुणविशेषीयाध्यायश्चतुर्विंशः ।
अथातो मांसगुणविशेषीयं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम मांसगुणविशेषीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अर्थात् इस अध्याय में मांस के सामान्य तथा विशेष गुणों का वर्णन किया जायेगा ।।१-२।।
मांसं वृष्यं च बल्यं च मांसं प्राणविवर्धनम् । मांसं पुष्टिकं वृद्धकृशानां मांसवर्धनम् ।।३।।
**मांस के सामान्य गुण—**मांस वृष्य, बल्य तथा प्राणों की शक्ति को बढ़ाने वाला है। यह पुष्टिकारक है तथा वृद्ध एवं कृश व्यक्तियों के मांस को बढ़ाता है।
**वक्तव्य—**शरीर के मांस की वृद्धि करने में मांस सबसे बढ़कर माना गया है। 'सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम्' इस सिद्धान्त के अनुसार शरीर के मांस तथा खाद्य मांस में मांसत्व के सामान्य होने से यह शरीर के मांस की वृद्धि करता है ।।३।।
क्षयिणां क्षीणदेहानां मांसमेव परायणम् । न मांसतुल्यमन्यत्त्वारोग्यवीर्यविवर्धनम् ।।४।।
क्षय के रोगी तथा क्षीण देह वाले व्यक्तियों के लिये मांस ही श्रेष्ठ द्रव्य है। उनके आरोग्य तथा वीर्य की वृद्धि के लिये मांस के समान और कोई पदार्थ नहीं है ।।४।।
नराणां क्षीणशुक्राणां मांसं रेतोभिवर्धनम् । बन्ध्यानामपि नारीणां कुमाराणां तथैव च ।।५।।
जिन व्यक्तियों का शुक्र (वीर्य) क्षीण हो गया है उनमें मांस से वीर्य की वृद्धि होती है। तथा बन्ध्या स्त्रियों में एवं बालकों में भी यह शुक्र धातु की वृद्धि करता है ।।५।।
गर्भाधानकरं मांसमन्ते पुष्टिकं तथा । गर्भिणीनां च नारीणां वातप्रशमनं परम् ।।६।।
मांस गर्भाधान (गर्भस्थिति) कराने वाला है तथा अन्त में गर्भ की पुष्टि करता है। गर्भिणी स्त्रियों में मांस का सेवन करने से वायु की शान्ति होती है ।।६।।
स्त्रीणां प्रसवकाले तु मांस ............ मेव च । गर्भकाले च बालानां सरसं परमौषधम् ।।७।।
प्रसव के समय स्त्रियों में मांस (रस) ..... श्रेष्ठ माना गया है। गर्भ के समय (गर्भस्थित) बालकों के लिये रसयुक्त मांस (अर्थात् मांसरस) श्रेष्ठ ओषधि माना गया है ।।७।।
स्त्रीप्रियाणां तथा पुंसां नित्यव्यायामसेविनाम् ।
क्षीणानां यक्ष्मणां चैव ज्वरक्षीणाश्च ये नराः ।।८।।
वाताहतास्तु ये सत्त्वास्तेषां मांसरसो हितः ।
जिन व्यक्तियों को स्त्रियां प्रिय हैं (अर्थात् जो स्त्रियों का सहवास अथवा मैथुन अधिक करते हों), जो नित्य व्यायाम करते हों तथा जो क्षीण एवं क्षय के रोगी हैं, जो ज्वर के कारण क्षीण हुए हैं तथा जो वातरोग से पीडित हैं—ऐसे व्यक्तियों में मांसरस हितकर होता है ।।८।।
सुसंस्कृतो मांसरसो बिडजीरकहिङ्गुभिः ।।९।।
स्नेहे सिद्धश्च पयसा विशेषाद्वातिके स्मृतः ।