काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished942 पृष्ठ
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५७० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
| विषय | पृ. | पं. | विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| निरूहयोग्या नरा: | २२३ | ७ | दत्तनस्यस्य हित आहारो विहारश्च | २४२ | १ |
| बस्तिकर्मप्रशंसा | २२३ | ९ | क्रियासिद्धिः ५ । | ||
| त्रिलक्षणा सिद्धिः २ । | पञ्चकर्मणि अजीर्णमैथुनयानोच्चैर्भाष्यादिवा- | ||||
| पञ्चकर्मसु त्रिविधयोगलक्षणान्यवेक्षेत | २२४ | १२ | स्वापातिच-ङ्क्रमणस्थानासात्म्यादिव- | ||
| विशोधनं कदा देयम् | २२५ | १ | र्जनोपदेशः | २४२ | ११ |
| विरेचनगुणा: | २२५ | ४ | अजीर्णादिसेवनजा व्यापदस्तासां चिकित्सा | ||
| दुर्दान्तलक्षणम् | २२५ | ६ | च | २४३ | १ |
| अतिवान्तलक्षणम् | २२५ | ९ | वर्जिता बस्तयः | २४३ | ५ |
| सम्यग्विरिक्तलक्षणम् | २२६ | १ | बस्तिप्रणेतृदोषजा व्यापदस्तासां चिकित्सा | ||
| दुर्विरिक्तस्य लक्षणम् | २२६ | ५ | च | २४३ | ६ |
| नस्यभेदा: | २२६ | ७ | बस्तिकर्मीया सिद्धिः ६ । | ||
| नस्यस्य समहीनातियोगलक्षणानि | २२६ | १० | बस्तिकर्मणोऽयोगातियोगलक्षणं | २४५ | ६ |
| स्वनुवासितलक्षणम् | २२७ | ३ | तच्चिकित्सा च | ||
| दुरुनुवासितलक्षणम् | २२७ | ४ | भृशमुत्पीडितबस्तेर्व्यापदस्तच्चिकित्सा च | २४६ | ३ |
| सम्यङ्निरूढलिङ्गानि | २२७ | ६ | पञ्चकर्मीया सिद्धिः ७ । | ||
| दुर्निरूढलक्षणम् | २२८ | १ | पञ्चकर्मविषये जीवकस्य प्रश्नाः | २४८ | ३ |
| अतिनिरूढलक्षणम् | २२८ | ३ | वमनानर्हा रोगाः | २४८ | ४ |
| कर्मबस्तिलक्षणम् | २२८ | ४ | वमनार्हा रोगा रोगिणश्च | २४८ | ७ |
| वमनविरेचनीया सिद्धिः ३ । | विरेचनार्हा रोगाः | २४९ | ३ | ||
| वमनौषधपानविधि: | २२८ | ९ | अविरेच्याः | २४९ | ६ |
| वमनस्य वेगसंख्यया हीनमध्योत्तमविभाग: | २२९ | ४ | शिरोविरेचनार्हा रोगाः | २५० | १ |
| वमनान्तरं कर्तव्य उपचार: | २२९ | ५ | स्नेहननस्ययोग्याः | २५० | ३ |
| बालरोगे शिशुधात्र्योरुभयोरपि संशोधनोपदेश: | २३१ | १ | अनुवासनार्हाः | २५० | ७ |
| विरेचनौषधदानविधि: | २३२ | ६ | अनुवासनायोग्याः | २५१ | २ |
| उत्तमवमनविरेचनयोर्लक्षणम् | २३३ | १ | निरूहणार्हाः | २५१ | ३ |
| वमनविरेचनयोर्व्यापदस्तच्चिकित्सा च | २३४ | ३ | अनिरूह्याः | २५१ | ४ |
| नस्तःकर्मीया सिद्धिः ४ । | निरूहानुवासनयोः प्रमाणम् | २५१ | ६ | ||
| नस्यभेदा: | २३८ | ५ | लङ्घनीया रोगाः | २५२ | १ |
| नस्यदानविधि: | २३८ | ६ | बृंहणीया रोगाः | २५२ | २ |
| प्रधमनावपीडनयोर्विधि: | २३८ | १३ | मङ्गलसिद्धिः ८ । | ||
| नस्यदाने परिहार्याणि | २३९ | ३ | गृहस्थ्यैर्मङ्गलान्येव सेव्यानि | २५२ | ८ |
| परिहार्याण्यपरिहरतो व्यापदस्तासां | २३९ | ५ | अनुवासननिरूहयोर्लक्षणम् | २५२ | १० |
| चिकित्सा च | अनुवासनार्थं शैशुकः स्नेहः | २५३ | १ |