काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished942 पृष्ठ
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५७२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अष्टज्वरचिकित्सितोत्तराध्यायः १९]
| विषय | पृ. | पं. | विषय | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| शतावरीकल्पाः | २८२ | ४ | विशेषकल्पाध्यायः ११ । | ||
| रेवतीकल्पाध्यायः ९ । | सन्निपातज्वरविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ३१९ | ३ | ||
| रेवत्याः प्रागुत्पत्तिः | २८२ | ८ | कश्यपस्योत्तरम् | ३२० | १ |
| कथंभूतां स्त्रियं जातहारिणी सज्जते | २८५ | ११ | सन्निपातज्वरहेतवः | ३२० | २ |
| कथंभूतानमनुष्याञ्जातहारिण्याविशति | २८७ | १ | सन्निपातज्वरस्य दुश्चिकित्स्यत्वम् | ३२० | ८ |
| जातहारिण्याविष्ठायाः स्त्रिया लक्षणानि | २८९ | ४ | सन्निपातज्वरस्य पूर्वरूपाणि | ३२१ | ३ |
| जातहारिण्या भेदास्तेषां लक्षणानि च | २८९ | ११ | सन्निपातज्वरस्य भेदास्तेषां लक्षणानि च | ३२१ | ४ |
| कस्यामवस्थायां जातहारिण्याविशति | २९४ | १ | सन्निपातज्वरे शीतलघृतयोर्निषेधः | ३२७ | १ |
| याः स्त्रिय आविश्य जातहारिण्यन्यां-<br>स्त्रियं प्रविशति तासां वर्णनम् | २९४ | ५ | सन्निपातज्वरे को दोष आदावुपक्रम्य इत्यत्र<br>विचारः | ३२७ | ८ |
| तिरश्च्या जातहारिण्या वर्णनम् | २९६ | १ | संनिपातज्वरे क्षौद्रनिषेधः | ३२८ | ७ |
| जातहारिणीग्रस्तस्य शिशो रूपाणि | २९९ | ३ | संनिपातज्वरे प्रारम्भोपक्रमाः | ३२८ | ११ |
| प्रजावरणबन्धविधिः | ३०० | २ | संनिपातज्वरे लङ्घनम् | ३२९ | १ |
| भोजनकल्पाध्यायः १० । | संनिपातज्वरे स्वेदनम् | ३२९ | ७ | ||
| भोजनविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ३०४ | १ | संनिपातज्वरे तृष्णाप्रशमनाय पानीयम् | ३३१ | २ |
| बुभुक्षितपिपासितयोर्लक्षणानि तत्रोपचारः | ३०५ | १ | संनिपातज्वरे पेयायूषरसादिविधानम् | ३३१ | ८ |
| तृष्णाया निदानम् | ३०५ | १३ | संनिपातज्वरे विरेचनम् | ३३३ | १ |
| अपतर्पितस्य लिङ्गानि | ३०६ | १ | संनिपातज्वरे कषाययोगाः | ३३३ | ३ |
| मन्दाशितस्य लिङ्गानि | ३०६ | ३ | संनिपातज्वरे उरःक्षतोपद्रवलक्षणम् | ३३५ | १ |
| अत्यशितमन्दाशितयोश्चिकित्सा | ३०६ | ५ | संनिपातज्वरे पित्तप्रकोपोपचिकित्सा | ३३५ | ५ |
| सम्यग्भुक्तवतो लक्षणानि | ३०६ | ७ | संनिपातज्वरे कटुकं सर्पिः | ३३५ | ९ |
| भोजनपानकालौ | ३०६ | ११ | निवृत्तसन्निपातो यथा रक्ष्यः | ३३६ | ५ |
| भोज्यानुपूर्वीवर्णनम् | ३०६ | १२ | सन्निपातस्यासाध्यलक्षणम् | ३३७ | १ |
| येषां शीतं जलं पथ्यम् | ३०८ | ११ | निवृत्तसन्निपातस्य हित आहारो विहारश्च | ३३७ | ३ |
| येषु देशेषु यद्यत् सात्म्यं तद्देशवासिनस्तैरेव<br>भोज्यैरुपक्रम्याः | ३०९ | ५ | सन्निपातज्वरे वर्जनीयानि | ३३७ | ११ |
| पेयाया गुणाः | ३१० | १४ | सन्निपातज्वरे पथ्यान्यन्नपानानि | ३३८ | १ |
| आमाशयवर्णनम् | ३११ | ५ | संहिताकल्पाध्यायः १२ । | ||
| येषां मांसरसो हितः, येषां चाहितः | ३११ | ७ | काश्यपसंहितायाः स्थानाध्यायनिरूपणम् | ३३९ | १ |
| तक्रगुणाः | ३११ | १५ | एतत्तन्त्राध्ययनफलम् | ३३९ | १२ |
| मण्डयूषयोर्गुणाः | ३१२ | ३ | रोगाणां प्रागुत्पत्तिः | ३४० | १ |
| यवागूगुणाः | ३१३ | ११ | अस्य तन्त्रस्य प्रतिसंस्कारेतिहासः | ३४० | ७ |
| क्षीरगुणाः | ३१४ | १ | खिलस्थानम् ९ । | ||
| इक्षुरसगुणाः | ३१७ | ५ | विषमज्वरनिर्देशीयाध्यायः १ । | ||
| विषमज्वरविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ३४२ | ३ |