काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished942 पृष्ठ
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विषयानुक्रमणिका
५७३
| विषय | पृ. | प | विषय | पृ. | प |
|---|---|---|---|---|---|
| कश्यपस्योत्तरम् | ३४२ | ९ | ज्वरे विपरीतप्रकृतौ सति सुखसाध्यत्वम् | ३५९ | ३ |
| समविषमज्वयोर्लक्षणम् | ३४३ | १ | केषां शमनं केषां च शोधनं हितम् | ३५९ | ६ |
| विषमज्वरस्य निदानपूर्विका संप्राप्तिः | ३४३ | ४ | शमनशोधनयोर्लक्षणम् | ३५९ | १० |
| विषमज्वरलक्षणम् | ३४४ | १ | शमनीयानि द्रव्याणि | ३६० | ३ |
| विषमज्वरस्य पुनः पुनरभ्यागमने हेतुः | ३४४ | ५ | शोधनानि | ३६० | ६ |
| सततकान्येद्युष्कतृतीयकचतुर्थकानां लक्षणानि | ३४५ | ६ | शमनशोधनानि द्रव्याणि | ३६० | ९ |
| चतुर्थकज्वरे दैवव्यपाश्रयचिकित्सा | ३४६ | ७ | दोषोपशमलक्षणम् | ३६० | १३ |
| पञ्चमादिदिने विषमज्वरानभ्यागमने हेतुः | ३४८ | १ | संक्षेपतश्चिकित्सोपदेशः | ३६१ | २ |
| मोक्षकाले ज्वराभिवर्धने हेतुः | ३४८ | ५ | चिकित्सा कथं विधेया | ३६१ | ४ |
| ज्वरविसृष्टौ हेतुः | ३४९ | २ | आर्षप्रयोगास्तथैव प्रयोक्तव्याः, तत्राविज्ञाय प्रक्षेपापचयौ न विधेयौ | ३६१ | ७ |
| शीतपूर्वदाहपूर्वज्वरयोर्हेतुः | ३४९ | ३ | वयःशरीराद्यवेक्ष्य मात्रा विधेया | ३६२ | १ |
| ज्वरे शिरोभितापे पादशैत्ये च हेतुः | ३५० | १० | भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ । | ||
| ज्वरे उष्णोपक्रमे हेतुः | ३५१ | १ | भैषज्योपक्रमादिविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ३६२ | ६ |
| जीर्णविषमज्वरचिकित्सा | ३५१ | १० | कश्यपस्योत्तरम् | ३६३ | १८ |
| विषमज्वरे दोषाधिक्येन चिकित्साविशेषः | ३५२ | २ | रोगभेदाः | ३६४ | ४ |
| विषमज्वरे सामान्यचिकित्सा | ३५२ | ६ | शारीरव्याधिहेतवः | ३६४ | ७ |
| विशेषनिर्देशीयाध्यायः २ । | मानसव्याधिहेतवः | ३६४ | ८ | ||
| सर्वज्वरचिकित्साविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ३५४ | ३ | शारीरमानसरोगयोः प्रतीकारः | ३६५ | १ |
| कश्यपस्योत्तरम् | ३५४ | ६ | निजागन्तुभेदेन रोगद्वैविध्यम् | ३६५ | ३ |
| अवस्थायां प्रयुक्तभेषजस्य गुणकारित्वम् | ३५४ | ८ | औषधभेदाः, तल्लक्षणं च | ३६५ | ८ |
| कस्मिञ्ज्वरे वमनं न देयम् | ३५४ | ९ | कषायशब्दनिरुक्तिः | ३६६ | ३ |
| कस्मिञ्ज्वरे वमनं न देयम् | ३५४ | १२ | कीदृशं भेषजं राजार्हं भवति | ३६६ | ७ |
| ज्वरे शिरोविरेचनम् | ३५५ | १ | सप्तविधकषायभेदास्तेषां लक्षणानि च | ३६६ | ११ |
| ज्वरे दोषबलाबलभेदेन चिकित्साभेदः | ३५५ | ३ | दशौषधकालाः | ३६७ | ९ |
| आमज्वरस्य लिङ्गानि | ३५५ | ८ | कस्यामवस्थायां केषु च भेषजं न प्रयोज्यम् | ३६९ | ५ |
| निरामज्वरस्य लिङ्गानि | ३५५ | ११ | ऊनद्वादशवर्षाणामेकान्तेन भेषजदाननिषेधः | ३६९ | १० |
| बहिर्मार्गगतज्वरलक्षणं तत्र चिकित्सा च | ३५६ | १ | कीदृशं भेषजं न योज्यम् | ३७० | २ |
| दोषदुर्बलौषधदुर्बललक्षणानि चिकित्सा च | ३५६ | ४ | कीदृशं भेषजमवचार्यम् | ३७० | ५ |
| ज्वरापहो लंघनादिक्रमः | ३५७ | ७ | औषधदानविधिः | ३७० | ९ |
| ज्वरे कषायः कदा देयः | ३५७ | ९ | पीतौषधेन वर्ज्यानि | ३७० | १२ |
| ज्वरे संशमनम् | ३५८ | ४ | जीर्यमाणभेषजलिङ्गानि | ३७१ | १ |
| ज्वरे सर्पिः | ३५८ | ६ | अन्नकालस्य लक्षणम् | ३७१ | ३ |
| ज्वरे विरेचनम् | ३५८ | १० | त्रिविधवयोभेदाः | ३७१ | ५ |
| ज्वरे निरूहानुवासनौ | ३५९ | १ |