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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished942 पृष्ठ
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विषयानुक्रमणिका
५७३
| विषय | पृ. | प | विषय | पृ. | प |
|---|---|---|---|---|---|
| कश्यपस्योत्तरम् | ३४२ | ९ | ज्वरे विपरीतप्रकृतौ सति सुखसाध्यत्वम् | ३५९ | ३ |
| समविषमज्वयोर्लक्षणम् | ३४३ | १ | केषां शमनं केषां च शोधनं हितम् | ३५९ | ६ |
| विषमज्वरस्य निदानपूर्विका संप्राप्तिः | ३४३ | ४ | शमनशोधनयोर्लक्षणम् | ३५९ | १० |
| विषमज्वरलक्षणम् | ३४४ | १ | शमनीयानि द्रव्याणि | ३६० | ३ |
| विषमज्वरस्य पुनः पुनरभ्यागमने हेतुः | ३४४ | ५ | शोधनानि | ३६० | ६ |
| सततकान्येद्युष्कतृतीयकचतुर्थकानां लक्षणानि | ३४५ | ६ | शमनशोधनानि द्रव्याणि | ३६० | ९ |
| चतुर्थकज्वरे दैवव्यपाश्रयचिकित्सा | ३४६ | ७ | दोषोपशमलक्षणम् | ३६० | १३ |
| पञ्चमादिदिने विषमज्वरानभ्यागमने हेतुः | ३४८ | १ | संक्षेपतश्चिकित्सोपदेशः | ३६१ | २ |
| मोक्षकाले ज्वराभिवर्धने हेतुः | ३४८ | ५ | चिकित्सा कथं विधेया | ३६१ | ४ |
| ज्वरविसृष्टौ हेतुः | ३४९ | २ | आर्षप्रयोगास्तथैव प्रयोक्तव्याः, तत्राविज्ञाय प्रक्षेपापचयौ न विधेयौ | ३६१ | ७ |
| शीतपूर्वदाहपूर्वज्वरयोर्हेतुः | ३४९ | ३ | वयःशरीराद्यवेक्ष्य मात्रा विधेया | ३६२ | १ |
| ज्वरे शिरोभितापे पादशैत्ये च हेतुः | ३५० | १० | भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ । | ||
| ज्वरे उष्णोपक्रमे हेतुः | ३५१ | १ | भैषज्योपक्रमादिविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ३६२ | ६ |
| जीर्णविषमज्वरचिकित्सा | ३५१ | १० | कश्यपस्योत्तरम् | ३६३ | १८ |
| विषमज्वरे दोषाधिक्येन चिकित्साविशेषः | ३५२ | २ | रोगभेदाः | ३६४ | ४ |
| विषमज्वरे सामान्यचिकित्सा | ३५२ | ६ | शारीरव्याधिहेतवः | ३६४ | ७ |
| विशेषनिर्देशीयाध्यायः २ । | मानसव्याधिहेतवः | ३६४ | ८ | ||
| सर्वज्वरचिकित्साविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ३५४ | ३ | शारीरमानसरोगयोः प्रतीकारः | ३६५ | १ |
| कश्यपस्योत्तरम् | ३५४ | ६ | निजागन्तुभेदेन रोगद्वैविध्यम् | ३६५ | ३ |
| अवस्थायां प्रयुक्तभेषजस्य गुणकारित्वम् | ३५४ | ८ | औषधभेदाः, तल्लक्षणं च | ३६५ | ८ |
| कस्मिञ्ज्वरे वमनं न देयम् | ३५४ | ९ | कषायशब्दनिरुक्तिः | ३६६ | ३ |
| कस्मिञ्ज्वरे वमनं न देयम् | ३५४ | १२ | कीदृशं भेषजं राजार्हं भवति | ३६६ | ७ |
| ज्वरे शिरोविरेचनम् | ३५५ | १ | सप्तविधकषायभेदास्तेषां लक्षणानि च | ३६६ | ११ |
| ज्वरे दोषबलाबलभेदेन चिकित्साभेदः | ३५५ | ३ | दशौषधकालाः | ३६७ | ९ |
| आमज्वरस्य लिङ्गानि | ३५५ | ८ | कस्यामवस्थायां केषु च भेषजं न प्रयोज्यम् | ३६९ | ५ |
| निरामज्वरस्य लिङ्गानि | ३५५ | ११ | ऊनद्वादशवर्षाणामेकान्तेन भेषजदाननिषेधः | ३६९ | १० |
| बहिर्मार्गगतज्वरलक्षणं तत्र चिकित्सा च | ३५६ | १ | कीदृशं भेषजं न योज्यम् | ३७० | २ |
| दोषदुर्बलौषधदुर्बललक्षणानि चिकित्सा च | ३५६ | ४ | कीदृशं भेषजमवचार्यम् | ३७० | ५ |
| ज्वरापहो लंघनादिक्रमः | ३५७ | ७ | औषधदानविधिः | ३७० | ९ |
| ज्वरे कषायः कदा देयः | ३५७ | ९ | पीतौषधेन वर्ज्यानि | ३७० | १२ |
| ज्वरे संशमनम् | ३५८ | ४ | जीर्यमाणभेषजलिङ्गानि | ३७१ | १ |
| ज्वरे सर्पिः | ३५८ | ६ | अन्नकालस्य लक्षणम् | ३७१ | ३ |
| ज्वरे विरेचनम् | ३५८ | १० | त्रिविधवयोभेदाः | ३७१ | ५ |
| ज्वरे निरूहानुवासनौ | ३५९ | १ |
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५७४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
| विषय | पृ. | प | विषय | पृ. | प |
|---|---|---|---|---|---|
| वयोभेदेन भेषजमात्राभेदः | ३७२ | १ | ओदनदोषाः | ३८४ | १२ |
| भेषजमात्रानिर्णयेऽग्न्यृतुसात्म्यादीन्यप्यवेक्षेत | ३७४ | १४ | यवागूसाधनपरिभाषा | ३८५ | १ |
| योगज्ञस्य भिषजः प्रशंसा | ३७५ | ३ | यवागूदोषाः | ३८५ | ४ |
| तीक्ष्णमृदुमध्यौषधयोग्या नराः | ३७६ | ४ | विविधरोगेषु यवागूविधानम् | ३८५ | ८ |
| यूषनिर्देशीयाध्यायः ४ । | भोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५ । | ||||
| आहारप्रशंसा | ३७७ | ४ | आहारगुणाः | ३८७ | ९ |
| आहारभेदाः | ३७८ | ३ | भोजनविधिः | ३८७ | १२ |
| आहारगुणः | ३७८ | ८ | आरोग्यलिङ्गानि | ३८८ | ५ |
| यूषगुणाः | ३७९ | ५ | अन्नकालाः | ३८९ | १ |
| यूषनिरुक्तिः | ३७९ | ९ | भोजनविधिनोपभुञ्जतो गुणाः | ३८९ | २ |
| यूषयवाग्वोर्लक्षणम् | ३७९ | ११ | मधुरादिरससात्म्यताया गुणा दोषाश्च | ३९२ | ८ |
| यूषभेदाः | ३७९ | १३ | घृतक्षीरतैलमांससात्म्यताया गुणाः | ३९३ | ३ |
| यूषरागखाडवपानकानां लक्षणम् | ३८१ | १ | भोजनोपकल्पना | ३९३ | ९ |
| वातरोगे हिता यूषाः | ३८१ | ३ | असम्यक्परिपाकहेतवः | ३९४ | ६ |
| क्वाथकल्कयोः पर्यायाः | ३८१ | ८ | समशनस्य लक्षणम् | ३९५ | १ |
| मुद्गयूषः | ३८१ | १० | अध्यशनस्य लक्षणम् | ३९५ | १ |
| विरसिकायूषः | ३८१ | १२ | प्रमृताशनस्य लक्षणम् | ३९५ | २ |
| रोचनयूषः | ३८१ | १३ | विषमाशनस्य लक्षणम् | ३९५ | २ |
| दाडिमयूषः | ३८१ | १३ | विरुद्धाशनस्य लक्षणम् | ३९५ | ३ |
| धात्रीयूषः | ३८१ | १४ | अजीर्णाशनस्य लक्षणम् | ३९५ | ३ |
| चित्रकयूषः | ३८१ | १५ | अत्यशनस्य लक्षणम् | ३९५ | ४ |
| मूलकयूषः | ३८१ | १७ | चतुर्विंशतिभोजनोपकल्पनाः केषु योज्याः | ३९५ | ६ |
| पञ्चकोलयूषः | ३८२ | २ | रसदोषविभागीयाध्यायः ६ । | ||
| धान्ययूषः | ३८२ | ४ | रसदोषविभागज्ञस्य भिषजः प्रशंसा | ३९६ | १ |
| कुलत्थयूषः | ३८२ | ८ | दोषभेदतो व्याधीनां द्विषष्ठिधा कल्पना | ३९६ | ३ |
| फलयूषः | ३८२ | १० | रसानां त्रिषष्ठिधा कल्पना | ३९८ | ३ |
| पुष्पयूषः | ३८२ | १२ | दोषभेदानवेक्ष्य रसा योज्याः | ३९९ | ३ |
| पत्रयूषः | ३८३ | १ | कफजे व्याधौ कटुतिक्तकषायाः क्रमशो योज्याः | ४०० | ३ |
| वल्कलयूषः | ३८३ | ३ | पित्तजे व्याधौ तिक्तस्वादुकषायाः क्रमशो योज्याः | ४०० | ८ |
| पल्लवयूषः | ३८३ | ५ | वातजे व्याधौ लवणाम्लकषायाः क्रमशो योज्याः | ४०० | १२ |
| काम्बलिकयूषः | ३८३ | १० | |||
| महायूषः | ३८३ | १४ | |||
| मूलकयूषः | ३८४ | ४ | |||
| ओदनगुणाः | ३८४ | ११ |
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विषयानुक्रमणिका ५७५
| पृ. | प | पृ. | प | ||
|---|---|---|---|---|---|
| पूर्वोक्तरसप्रविचारणाया ज्वरे<br>उदाहरणरूपेण प्रयोगदर्शनम् | ४०१ | १ | निरूहगुणाः | ४३० | १ |
| दोषविकल्पानवेक्ष्य रसानां प्रक्षेप्रावकषौँ<br>विधेयौ | ४०१ | ९ | सम्यङ्निरूढलिङ्गानि | ४३० | ४ |
| पूर्वोक्तद्विषष्टिदोषभेदानां विस्तरतो वर्णनम् | ४०२ | ३ | निरूहायोगातियोगलिङ्गानि | ४३० | ७ |
| पूर्वोक्तद्विषष्टिरसभेदानां विस्तरतो वर्णनम् | ४०४ | १४ | निरूढस्यानुवासनप्रयोगः | ४३० | ९ |
| संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७ । | अनुवासनगुणाः | ४३१ | ५ | ||
| संशोधनमधिकृत्य षट्सु ऋतुषु दोषाणां<br>संचयप्रकोपोपशमवर्णनम् | ४०७ | ९ | अनुवासनार्थं फलतैलम् | ४३२ | १ |
| हेत्वीरितदोषस्य शीघ्रोपक्रमोपदेशः | ४०९ | ३ | अनुवासनार्थं एरण्डबस्तिः | ४३२ | १२ |
| बहुदोषस्य लक्षणम् | ४१० | १ | अनुवासनमात्राः | ४३३ | १ |
| बहुमध्याल्पबलेषु दोषेषु चिकित्साविशेषः | ४१० | ४ | निरूहमात्रा | ४३४ | १ |
| स्नेहनगुणाः | ४११ | १ | प्रधानमध्यावरा मात्राः केषु योज्याः | ४३४ | ४ |
| स्वेदनगुणाः | ४११ | २ | रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९ । | ||
| शोधनगुणाः | ४११ | ४ | रक्तगुल्मविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ४३४ | ११ |
| शोधनविधिः | ४१३ | १ | कश्यपस्योत्तरम् | ४३५ | १४ |
| शुद्धस्यान्नसंसर्जनक्रमः | ४१३ | ९ | गर्भाशयस्य रजस उत्पत्तेश्च वर्णनम् | ४३५ | १७ |
| वमनविधिः | ४१४ | ११ | रक्तगुल्मस्य संप्राप्ति | ४३६ | १० |
| विरेचनविधिः | ४१७ | २ | रक्तगुल्मस्य लक्षणानि | ४३७ | ९ |
| प्रधानमध्यमावरशुद्धिलक्षणम् | ४१७ | ९ | रक्तगुल्मस्य निरुक्तिः | ४३८ | ५ |
| वमनविरेचनयोर्व्यापदस्तासां चिकित्सा च | ४१७ | ११ | रक्तगुल्मे गर्भसमानलक्षणोत्पत्तौ हेतुः | ४३९ | १ |
| कथंभूतं भेषजं सम्यक्शुद्धिमावहति | ४१९ | १२ | रक्तगुल्मे कालप्रकर्षे हेतुः | ४३९ | १० |
| बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८ । | रक्तगुल्मस्य दशममासात्परमुपक्रम्यत्वे हेतुः | ४४० | १ | ||
| बस्तिकर्मणः प्रशंसा | ४२० | ७ | रक्तगुल्मगर्भयोर्विशिष्टलक्षणानि | ४४० | ४ |
| बस्तिकर्मणस्त्रयो भेदास्तेषां लक्षणानि च | ४२१ | ५ | रक्तगुल्मगर्भयोर्निश्चयं विधायैव चिकित्सा<br>विधेया | ४४१ | ३ |
| चतुर्भद्राख्यश्रुतार्थो बस्तिकल्पः | ४२३ | १० | पूर्णे प्रसवकाले प्रवर्तमानरक्तनिवारणनिषेधः | ४४२ | ५ |
| अयुग्मबस्तिदानोपदेशः | ४२४ | ५ | रक्तगुल्मे चिकित्सासूत्रम् | ४४२ | ८ |
| बस्तिकर्मसाध्या रोगाः | ४२४ | १० | रक्तगुल्मे वर्ज्यानि | ४४३ | १ |
| निरूहप्रणिधानविधिः | ४२५ | १ | रक्तगुल्मोपद्रवाः | ४४३ | २ |
| निरूहबस्तिप्रमाणोत्कर्षापकर्षविधिः | ४२६ | ८ | रक्तगुल्मस्य शैथिल्यकरण- भेदनार्थं<br>चिकित्सा | ४४३ | ३ |
| कथंभूतं निरूहमुपकल्पयेत् | ४२८ | १ | अन्तर्वलीचिकित्सिताध्यायः १० । | ||
| अतोऽन्यथाप्रयोगे व्यापदः | ४२८ | ४ | अन्तर्वत्नीचिकित्सितोपक्रमः | ४४५ | ३ |
| कथंभूतो बस्तिः प्रशस्यते | ४२९ | ९ | गर्भिण्या ज्वरस्य विशेषतः कष्टकारकत्वम् | ४४५ | ५ |
| गर्भिण्या ज्वरस्य निदानम् | ४४५ | ७ |
५९ का. सं.
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५७६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
| विषय | पृ. | प | विषय | पृ. | प |
|---|---|---|---|---|---|
| गर्भिणीज्वरस्य चिकित्सासूत्रम् | ४४५ | १० | त्रिविधदेशभेदेन सूतिकोपक्रमे विशेषः | ४६७ | ८ |
| तरुणे गर्भे अभ्यङ्ग-शिरोविरेक-धूमपान-स्वेद-वमन-स्रंसनास्थापनानुवासननिषेधः | ४४७ | २ | सूतिकाज्वरस्य निदानम् | ५६९ | १ |
| गर्भिण्याः वातज्वरे हिता योगाः | ४४८ | ६ | सूतिकाज्वरस्य दुरुपक्रमत्वे हेतुः | ४६९ | ७ |
| गर्भिण्या पित्तज्वरे हिता योगाः | ४४९ | १० | वातजादिभेदेन सूतिकाज्वरस्य लक्षणानि | ४७० | १० |
| गर्भिण्याः श्लेष्मज्वरे हिता योगाः | ४५० | ७ | स्तन्यागमोत्थज्वरस्य लक्षणम् | ४७१ | १० |
| गर्भिण्याः संसृष्टज्वरे हिता योगाः | ४५० | १० | सूतिकाया आगन्तुज्वरलिङ्गानि | ४७२ | १ |
| मद्यपाया गर्भिण्याश्चिकित्सा | ४५१ | ६ | सूतिकाज्वरे अवस्थाभेदेनोपक्रमः | ४७३ | ९ |
| गर्भिण्या अतिसारे चिकित्सा | ४५१ | ११ | वातजे सूतिकाज्वरे चिकित्सा | ४७४ | ११ |
| गर्भिण्या परिकर्तिकायां चिकित्सा | ४५५ | ७ | पित्तजे सूतिकाज्वरे चिकित्सा | ४७६ | १० |
| गर्भिण्या मुखपाके चिकित्सा | ४५६ | १ | कफजे सूतिकाज्वरे चिकित्सा | ४७८ | ९ |
| गर्भिण्या आक्षेपाकपतानकयोश्चिकित्सा | ४५६ | ५ | सन्निपातजे सूतिकाज्वरे चिकित्सा | ४७९ | १४ |
| गर्भिण्या छर्द्यां चिकित्सा | ४५७ | ३ | जातकर्मोत्तराध्यायः १२ । | ||
| गर्भिण्या कामलायां चिकित्सा | ४५८ | ३ | प्रथमे मासि शिशोः सूर्योदयस्य दर्शनोपस्थापनं प्रदोषे चन्द्रमसश्च | ४८३ | ३ |
| गर्भिण्या हृद्रोगे चिकित्सा | ४५८ | ५ | चतुर्थे मासि शिशोः अन्तर्गृहान्निष्क्रमणविधिः | ४८३ | ५ |
| गर्भिण्या कासे चिकित्सा | ४५८ | ११ | षष्ठे मासि भूमावभ्यासार्थं सकृदुपवेशनविधिः | ४८३ | १२ |
| गर्भिण्या दोषभेदेन जायमानेषु कासेषु चिकित्सा | ४५८ | १२ | शिशोश्शिरोपवेशननिषेधः | ४८५ | १ |
| गर्भिण्या श्वासरोगे चिकित्सा | ४५९ | ३ | षष्ठे मासि शिशोः फलप्राशनम् | ४८५ | ८ |
| गर्भिण्या ऊर्ध्ववाते चिकित्सा | ४५९ | १० | जातदन्तस्य दशमे मासि अन्नप्राशनविधिः | ४८५ | ९ |
| गर्भि ङ्कायां चिकित्सा | ४५९ | ११ | बालानाम्नदानविधिः | ४८७ | १ |
| गर्भिण्या मूत्रग्रहेषु चिकित्सा | ४५९ | १४ | कुक्कुणकचिकित्साध्यायः १३ । | ||
| गर्भिण्या चतुर्थादिमासेषु जायमानरोगचिकित्सा | ४६० | ३ | कुक्कुणकस्य निदानम् | ४८७ | ९ |
| गर्भिण्या विषाबाधाचिकित्सा | ४६१ | ३ | कुक्कुणकस्य लिङ्गानि | ४८८ | ८ |
| गर्भिण्य अरिष्टालिङ्गानि | ४६१ | १० | कुक्कुणकस्य चिकित्सा | ४८८ | १२ |
| गर्भिण्य हितो विहारः | ४६३ | १२ | विसर्पचिकित्सिताध्यायः १४ । | ||
| सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११ । | विसर्पविषये वृद्धजीवकस्य प्रश्नाः | ४९६ | ३ | ||
| चतुःषष्टिर्दुब्भजातामयाः | ४६४ | ११ | कश्यपस्योत्तरं | ४९७ | ३ |
| सूतिकोपक्रमेऽप्रमत्तेन भवित यम् | ४६६ | १ | विसर्पस्य प्रागुत्पत्तिः | ४९७ | ४ |
| सूतिकाया उदरे पीडनपूर्वकं पट्टवेष्टनम् | ४६६ | ५ | विसर्पस्य निरुक्तिः | ४९७ | ६ |
| सूतिकायाः स्वेदनम् | ४६६ | ९ | विसर्पस्य निदानम् | ४९७ | ७ |
| सूतिकायाः धूपनम् | ४६७ | १ | विसर्पस्य भेदाः | ४९८ | १ |
| सूतिकायाः अन्नपानविधिः | ४६७ | २ | विसर्पे रक्तावसेकवस्य परमौषधत्वम् | ४९८ | ३ |
| विसर्पस्य वातजादिभेदेन लक्षणानि | ४९८ | ६ |
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विषयानुक्रमणिका
<div align="right">५७७</div>| विषय | पृ. | प | विषय | पृ. | प |
|---|---|---|---|---|---|
| विसर्पस्य सामान्यचिकित्सा | ४९९ | १ | शोथानां सामान्यचिकित्सा | ५२१ | ९ |
| वातजविसर्पस्य चिकित्सा | ४९९ | ४ | वातिकशोथस्य चिकित्सा | ५२४ | ६ |
| पैत्तिकविसर्पस्य चिकित्सा | ५०१ | ७ | पैत्तिकशोथस्य चिकित्सा | ५२५ | ११ |
| श्लैष्मिकविसर्पस्य चिकित्सा | ५०४ | ११ | कफजशोथस्य चिकित्सा | ५२६ | १३ |
| संसर्गजविसर्पस्य चिकित्सा | ५०६ | ११ | आगन्तुकशोथस्य चिकित्सा | ५२९ | ६ |
| चर्मदलचिकित्सिताध्यायः १५ । | शोथोपद्रवाः चिकित्सा | ५२९ | ७ | ||
| चर्मदलविषये वृद्धजीवकस्य प्रश्नाः | ५०७ | ५ | शूलचिकित्सिताध्यायः १८ । | ||
| कश्यपस्योत्तरम् | ५०८ | ३ | शूलस्य निदानपूर्विका संप्राप्तिः | ५३० | ३ |
| चर्मदलस्य निदानम् | ५०८ | ४ | शूलस्य वातजादिभेदेन लिङ्गानि | ५३० | ७ |
| महतां चर्मदलासंभवे हेतुः | ५०८ | ७ | वातिशूलस्य चिकित्सा | ५३० | ११ |
| चर्मदलभेदाः | ५०८ | ९ | पैत्तिकशूलस्य चिकित्सा | ५३१ | ४ |
| वातिकचर्मदलस्य निदानसंप्राप्तिपूर्वकं लक्षणम् | ५०९ | १ | श्लैष्मिकशूलस्य चिकित्सा | ५३१ | १२ |
| पैत्तिकचर्मदलस्य निदानसंप्राप्तिपूर्वकं लक्षणम् | ५०९ | ६ | शूले घृततैल्योः | ५३३ | ७ |
| श्लैष्मिकचर्मदलस्य निदानसंप्राप्तिपूर्वकं लक्षणम् | ५१० | १ | शूले बस्तियोगाः | ५३४ | ८ |
| सान्निपातिकचर्मदलस्य निदानसंप्राप्तिपूर्वकं लक्षणम् | ५१० | ७ | अष्टज्वरचिकित्सितोत्तराध्यायः १९ । | ||
| चर्मदलस्य साध्यासाध्यत्वविचारः | ५१० | ११ | वातज्वरहरा योगाः | ५३६ | ७ |
| वातिकचर्मदलस्य चिकित्सा | ५११ | १ | वातश्लेष्मज्वरहरा योगाः | ५३८ | ११ |
| पैत्तिकचर्मदलस्य चिकित्सा | ५११ | १२ | ज्वरे दोषविशेषेण चिकित्साविशेषः | ५४० | १ |
| श्लैष्मिकचर्मदलस्य चिकित्सा | ५१२ | १० | सन्निपातज्वरचिकित्सा | ५४० | ५ |
| अम्लपित्तचिकित्सिताध्यायः १६ । | मधुन उष्णयोगनिषेधः | ५४३ | २ | ||
| अम्लपित्तस्य निदानपूर्विका संप्राप्तिः | ५१४ | ३ | क्षीरगुणविशेषीयाध्यायः २० । | ||
| अम्लपित्तस्य लक्षणम् | ५१५ | ५ | क्षीरभेदाः | ५४४ | ४ |
| अम्लपित्तस्य चिकित्सा | ५१६ | १ | क्षीरसामान्यगुणाः | ५४४ | ७ |
| अम्लपित्तस्य उपद्रवाः | ५१८ | १० | गोक्षीरगुणाः | ५४५ | ३ |
| शोथचिकित्सिताध्यायः १७ । | महिषीक्षीरगुणाः | ५४६ | १३ | ||
| शोथस्य निदानम् | ५१९ | ४ | अजाक्षीणगुणाः | ५४७ | १ |
| शोथस्य भेदाः | ५१९ | ९ | उष्ट्रीक्षीरगुण | ५४७ | ४ |
| शोथानां वातजादिभेदेन लिङ्गानि | ५२० | २ | पानीयगुणविशेषीयाध्यायः २१ । | ||
| शोथानां असाध्यलिङ्गानि | ५२१ | ८ | हंसोदकगुणाः | ५४८ | १ |
| ऋतुभेदेनोदकगुणाः | ५४८ | ४ | |||
| अप्रशस्तं जलं | ५४९ | १ | |||
| आन्तरिक्षजलगुणाः | ५४९ | ३ | |||
| देशभेदेन नदीगुणाः | ५४९ | ६ |
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५७८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
| विषय | पृ. | प | विषय | पृ. | प |
|---|---|---|---|---|---|
| औद्भित्पदिजलगुणाः | ५४९ | ९ | नानाविधपशुपक्षिणां | ५५४ | २ |
| पानार्हं जलं | ५५० | १ | नानाविधजलचरमांसगुणाः | ५५६ | ३ |
| पानायोग्यं जलं | ५५० | ३ | मांसवर्गेषु श्रेष्ठाः प्राणिनः | ५५७ | ५ |
| भक्तादिमध्यान्तपीतजलगुणाः | ५५० | १२ | शरीरावयवेषु गुरुलघुत्वम् | ५५७ | ९ |
| शृतशीतजलगुणाः | ५५१ | १ | अवस्थाविशेषेण गुरुलघुत्वम् | ५५८ | १ |
| ऋतुभेदे पेयं जलं | ५५१ | ७ | शरीर-भोजन-देशादिविशेषेण | ५५८ | ४ |
| मांसगुणविशेषीयाध्यायः २२ । | देशसात्म्याध्यायः २३ । | ||||
| मांससामान्यगुणः | ५५२ | ३ | मध्यदेशः, तज्जानां सात्म्यं च | ५५९ | ३ |
| मांसरसगुणाः | ५५२ | ८ | पूर्वदेशाः, तज्जानां सात्म्यं च | ५५९ | ८ |
| संस्कारविशेषेण मांसगुणाः | ५५३ | ६ | दक्षिणदेशाः, तज्जानां सात्म्यं च | ५६० | ३ |
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॥ अन्य महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ ॥
- अष्टाङ्गहृदयम्। अरुणदत्त कृत। सटिप्पण 'सर्वाङ्गसुन्दरी' तथा हेमाद्रिकृत 'आयुर्वेदरसायन' व्याख्या सहित। सम्पा. वैद्य हरिशास्त्र पराड़कर। (का. 315)
- सुश्रुत संहिता। श्रीडल्हणाचार्य विरचित निबन्धसंग्रहव्याख्या सहित। सम्पादक - यादवजीत्रिक्रमजी आचार्य (का. 316)
- चरक संहिता - महर्षि पुनर्वसुनोपदिष्टा, तच्छिष्येणाग्निवेशेन प्रणीता, चरकदृढ़बलाभ्यां प्रति संस्कृत श्री चक्रपाणिदत्त विरचितया आयुर्वेद दीपिका व्याख्या संवलिता। आचार्योपाह्वेन त्रिक्रमात्मजेन यादवशर्मणा संशोधिता (MIS 54)
- शार्ङ्गधर संहिता। शार्ङ्गधराचार्य प्रणीत। भिषग्वर आढमल्ल विरचित 'दिपिका' प. काशीनाथ वैद्य प्रणीत 'गूढार्थदीपिका' टीका एवं पण्डित परशुराम शास्त्री संशोधित। (MIS 44)
- माधवनिदानम्। माधवकर कृत। विजयरक्षित तथा कण्ठदत्त कृत 'मधुकोष' संस्कृत टीका तथा ब्रह्मशंकर शास्त्री कृत 'मनोरमा' हिन्दी टीका (का. 159)
- रसरत्नसमुच्चय। श्री वाग्भट्टाचार्य कृत। संस्कृत मूल, 'रसप्रभा' हिन्दी टीका, टिप्पणीयुक्त। डॉ. इन्द्रदेव त्रिपाठी। (चौ.सं.भ. 12)
- गदनिग्रहः। सोढ़ल कृत। इन्द्रदेव त्रिपाठी कृत 'विद्योतिनी' हिन्दी टीका। सं. गंगा सहाय पाण्डेय।
(1-3 भाग) सम्पूर्ण (का. 182) - गुणरत्नमाला। भावमिश्र कृत। डॉ. कैलाशपति पाण्डेय एवम् डॉ. अनुग्रह नारायण
सिंह कृत 'प्रकाश' हिन्दी व्याख्या व सम्पादन। प्राक्कथन आचार्य प्रियव्रत शर्मा कृत (चौ.सं.भ. 63) - चरक संहिता। अग्निवेश कृत। चरक एवं दृढ़बल संशोधित। 'चक्रपाणि दत्त' कृत 'आयुर्वेद दीपिका'
टीका तथा काशीनाथ शास्त्री कृत 'विद्योतिनी' हिन्दी टीका।
सं.-गंगासहाय पाण्डेय। प्रियव्रत शर्मा कृत भूमिका। (1-2 भाग) सम्पूर्ण (का. 194) - द्रव्यगुणसूत्रम्। (Aphorisms on Dravyaguna). डॉ. प्रियव्रत शर्मा कृत स्वोपज्ञभाष्य
(With English Translation) हिन्दी अनुवाद डॉ. सत्यदेव दूबे (चौ.सं.भ. 1) - वनौषधि चन्द्रोदय। चन्द्रराज भण्डारी कृत। (1-10) भाग 2 जिल्द में सम्पूर्ण (का. 161)
- सुश्रुत संहिता। महर्षि सुश्रुत कृत। अम्बिका दत्त शास्त्री आदि कृत 'आयुर्वेद तत्व
संदीपिका' हिन्दी टीकादि। पी. एम. मेहता कृत प्रस्तावना। (1-2 भाग) सम्पूर्ण (का. 156) - Encyclopaedic Dictionary of Ayurveda. by Dr. Kanjiv Lochan & Dr. P.S. Byadgi (MIS 36)
- Bhaisajya Ratnavali. Composed by Govinda Das Ji Bhisagratna. Commented upon Dr. Ambika Datta Shastri. Eng. Trans. Dr. Kanjiv lochan and Technically reviewed by Dr. Anand K. Choudhary (Vol. 1-3) Complete (C.S.B. 67)
- Rasendra Sara Sangrah of Sri Gopala Krishna Bhatt. Text with English Translation 'Parimita Bhodhini' Commentary & Appendix Dr. P. Suresh & Dr. D. Vinaya Kumari Dhannapuneni (C.S.B. 72)
- Vikriti Vijnana and Roga Vijnana (Ayurvediya). by P.S. Byadgi
Vol. - I (Vikriti Vijnana) & Vol. - II (Roga Vijnana) (MIS 3)
CHAUKHAMBHA SANSKRIT SANSTHAN, VARANASI (U.P.) INDIA
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ISBN : 81-86937-67-6