काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished942 पृष्ठ
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५७६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
| विषय | पृ. | प | विषय | पृ. | प |
|---|---|---|---|---|---|
| गर्भिणीज्वरस्य चिकित्सासूत्रम् | ४४५ | १० | त्रिविधदेशभेदेन सूतिकोपक्रमे विशेषः | ४६७ | ८ |
| तरुणे गर्भे अभ्यङ्ग-शिरोविरेक-धूमपान-स्वेद-वमन-स्रंसनास्थापनानुवासननिषेधः | ४४७ | २ | सूतिकाज्वरस्य निदानम् | ५६९ | १ |
| गर्भिण्याः वातज्वरे हिता योगाः | ४४८ | ६ | सूतिकाज्वरस्य दुरुपक्रमत्वे हेतुः | ४६९ | ७ |
| गर्भिण्या पित्तज्वरे हिता योगाः | ४४९ | १० | वातजादिभेदेन सूतिकाज्वरस्य लक्षणानि | ४७० | १० |
| गर्भिण्याः श्लेष्मज्वरे हिता योगाः | ४५० | ७ | स्तन्यागमोत्थज्वरस्य लक्षणम् | ४७१ | १० |
| गर्भिण्याः संसृष्टज्वरे हिता योगाः | ४५० | १० | सूतिकाया आगन्तुज्वरलिङ्गानि | ४७२ | १ |
| मद्यपाया गर्भिण्याश्चिकित्सा | ४५१ | ६ | सूतिकाज्वरे अवस्थाभेदेनोपक्रमः | ४७३ | ९ |
| गर्भिण्या अतिसारे चिकित्सा | ४५१ | ११ | वातजे सूतिकाज्वरे चिकित्सा | ४७४ | ११ |
| गर्भिण्या परिकर्तिकायां चिकित्सा | ४५५ | ७ | पित्तजे सूतिकाज्वरे चिकित्सा | ४७६ | १० |
| गर्भिण्या मुखपाके चिकित्सा | ४५६ | १ | कफजे सूतिकाज्वरे चिकित्सा | ४७८ | ९ |
| गर्भिण्या आक्षेपाकपतानकयोश्चिकित्सा | ४५६ | ५ | सन्निपातजे सूतिकाज्वरे चिकित्सा | ४७९ | १४ |
| गर्भिण्या छर्द्यां चिकित्सा | ४५७ | ३ | जातकर्मोत्तराध्यायः १२ । | ||
| गर्भिण्या कामलायां चिकित्सा | ४५८ | ३ | प्रथमे मासि शिशोः सूर्योदयस्य दर्शनोपस्थापनं प्रदोषे चन्द्रमसश्च | ४८३ | ३ |
| गर्भिण्या हृद्रोगे चिकित्सा | ४५८ | ५ | चतुर्थे मासि शिशोः अन्तर्गृहान्निष्क्रमणविधिः | ४८३ | ५ |
| गर्भिण्या कासे चिकित्सा | ४५८ | ११ | षष्ठे मासि भूमावभ्यासार्थं सकृदुपवेशनविधिः | ४८३ | १२ |
| गर्भिण्या दोषभेदेन जायमानेषु कासेषु चिकित्सा | ४५८ | १२ | शिशोश्शिरोपवेशननिषेधः | ४८५ | १ |
| गर्भिण्या श्वासरोगे चिकित्सा | ४५९ | ३ | षष्ठे मासि शिशोः फलप्राशनम् | ४८५ | ८ |
| गर्भिण्या ऊर्ध्ववाते चिकित्सा | ४५९ | १० | जातदन्तस्य दशमे मासि अन्नप्राशनविधिः | ४८५ | ९ |
| गर्भि ङ्कायां चिकित्सा | ४५९ | ११ | बालानाम्नदानविधिः | ४८७ | १ |
| गर्भिण्या मूत्रग्रहेषु चिकित्सा | ४५९ | १४ | कुक्कुणकचिकित्साध्यायः १३ । | ||
| गर्भिण्या चतुर्थादिमासेषु जायमानरोगचिकित्सा | ४६० | ३ | कुक्कुणकस्य निदानम् | ४८७ | ९ |
| गर्भिण्या विषाबाधाचिकित्सा | ४६१ | ३ | कुक्कुणकस्य लिङ्गानि | ४८८ | ८ |
| गर्भिण्य अरिष्टालिङ्गानि | ४६१ | १० | कुक्कुणकस्य चिकित्सा | ४८८ | १२ |
| गर्भिण्य हितो विहारः | ४६३ | १२ | विसर्पचिकित्सिताध्यायः १४ । | ||
| सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११ । | विसर्पविषये वृद्धजीवकस्य प्रश्नाः | ४९६ | ३ | ||
| चतुःषष्टिर्दुब्भजातामयाः | ४६४ | ११ | कश्यपस्योत्तरं | ४९७ | ३ |
| सूतिकोपक्रमेऽप्रमत्तेन भवित यम् | ४६६ | १ | विसर्पस्य प्रागुत्पत्तिः | ४९७ | ४ |
| सूतिकाया उदरे पीडनपूर्वकं पट्टवेष्टनम् | ४६६ | ५ | विसर्पस्य निरुक्तिः | ४९७ | ६ |
| सूतिकायाः स्वेदनम् | ४६६ | ९ | विसर्पस्य निदानम् | ४९७ | ७ |
| सूतिकायाः धूपनम् | ४६७ | १ | विसर्पस्य भेदाः | ४९८ | १ |
| सूतिकायाः अन्नपानविधिः | ४६७ | २ | विसर्पे रक्तावसेकवस्य परमौषधत्वम् | ४९८ | ३ |
| विसर्पस्य वातजादिभेदेन लक्षणानि | ४९८ | ६ |