काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished942 पृष्ठ
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विषयानुक्रमणिका ५७५
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|---|---|---|---|---|---|
| पूर्वोक्तरसप्रविचारणाया ज्वरे<br>उदाहरणरूपेण प्रयोगदर्शनम् | ४०१ | १ | निरूहगुणाः | ४३० | १ |
| दोषविकल्पानवेक्ष्य रसानां प्रक्षेप्रावकषौँ<br>विधेयौ | ४०१ | ९ | सम्यङ्निरूढलिङ्गानि | ४३० | ४ |
| पूर्वोक्तद्विषष्टिदोषभेदानां विस्तरतो वर्णनम् | ४०२ | ३ | निरूहायोगातियोगलिङ्गानि | ४३० | ७ |
| पूर्वोक्तद्विषष्टिरसभेदानां विस्तरतो वर्णनम् | ४०४ | १४ | निरूढस्यानुवासनप्रयोगः | ४३० | ९ |
| संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७ । | अनुवासनगुणाः | ४३१ | ५ | ||
| संशोधनमधिकृत्य षट्सु ऋतुषु दोषाणां<br>संचयप्रकोपोपशमवर्णनम् | ४०७ | ९ | अनुवासनार्थं फलतैलम् | ४३२ | १ |
| हेत्वीरितदोषस्य शीघ्रोपक्रमोपदेशः | ४०९ | ३ | अनुवासनार्थं एरण्डबस्तिः | ४३२ | १२ |
| बहुदोषस्य लक्षणम् | ४१० | १ | अनुवासनमात्राः | ४३३ | १ |
| बहुमध्याल्पबलेषु दोषेषु चिकित्साविशेषः | ४१० | ४ | निरूहमात्रा | ४३४ | १ |
| स्नेहनगुणाः | ४११ | १ | प्रधानमध्यावरा मात्राः केषु योज्याः | ४३४ | ४ |
| स्वेदनगुणाः | ४११ | २ | रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९ । | ||
| शोधनगुणाः | ४११ | ४ | रक्तगुल्मविषये जीवकस्य प्रश्नाः | ४३४ | ११ |
| शोधनविधिः | ४१३ | १ | कश्यपस्योत्तरम् | ४३५ | १४ |
| शुद्धस्यान्नसंसर्जनक्रमः | ४१३ | ९ | गर्भाशयस्य रजस उत्पत्तेश्च वर्णनम् | ४३५ | १७ |
| वमनविधिः | ४१४ | ११ | रक्तगुल्मस्य संप्राप्ति | ४३६ | १० |
| विरेचनविधिः | ४१७ | २ | रक्तगुल्मस्य लक्षणानि | ४३७ | ९ |
| प्रधानमध्यमावरशुद्धिलक्षणम् | ४१७ | ९ | रक्तगुल्मस्य निरुक्तिः | ४३८ | ५ |
| वमनविरेचनयोर्व्यापदस्तासां चिकित्सा च | ४१७ | ११ | रक्तगुल्मे गर्भसमानलक्षणोत्पत्तौ हेतुः | ४३९ | १ |
| कथंभूतं भेषजं सम्यक्शुद्धिमावहति | ४१९ | १२ | रक्तगुल्मे कालप्रकर्षे हेतुः | ४३९ | १० |
| बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८ । | रक्तगुल्मस्य दशममासात्परमुपक्रम्यत्वे हेतुः | ४४० | १ | ||
| बस्तिकर्मणः प्रशंसा | ४२० | ७ | रक्तगुल्मगर्भयोर्विशिष्टलक्षणानि | ४४० | ४ |
| बस्तिकर्मणस्त्रयो भेदास्तेषां लक्षणानि च | ४२१ | ५ | रक्तगुल्मगर्भयोर्निश्चयं विधायैव चिकित्सा<br>विधेया | ४४१ | ३ |
| चतुर्भद्राख्यश्रुतार्थो बस्तिकल्पः | ४२३ | १० | पूर्णे प्रसवकाले प्रवर्तमानरक्तनिवारणनिषेधः | ४४२ | ५ |
| अयुग्मबस्तिदानोपदेशः | ४२४ | ५ | रक्तगुल्मे चिकित्सासूत्रम् | ४४२ | ८ |
| बस्तिकर्मसाध्या रोगाः | ४२४ | १० | रक्तगुल्मे वर्ज्यानि | ४४३ | १ |
| निरूहप्रणिधानविधिः | ४२५ | १ | रक्तगुल्मोपद्रवाः | ४४३ | २ |
| निरूहबस्तिप्रमाणोत्कर्षापकर्षविधिः | ४२६ | ८ | रक्तगुल्मस्य शैथिल्यकरण- भेदनार्थं<br>चिकित्सा | ४४३ | ३ |
| कथंभूतं निरूहमुपकल्पयेत् | ४२८ | १ | अन्तर्वलीचिकित्सिताध्यायः १० । | ||
| अतोऽन्यथाप्रयोगे व्यापदः | ४२८ | ४ | अन्तर्वत्नीचिकित्सितोपक्रमः | ४४५ | ३ |
| कथंभूतो बस्तिः प्रशस्यते | ४२९ | ९ | गर्भिण्या ज्वरस्य विशेषतः कष्टकारकत्वम् | ४४५ | ५ |
| गर्भिण्या ज्वरस्य निदानम् | ४४५ | ७ |
५९ का. सं.