कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 36, कुल 182 में से
संदर्भ में पढ़ें| २४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा
य एवं विद्वांश्चिनुते नाचिकेतम् ।
स मृत्युपाशान्पुरतः प्रणोद्य
शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १८ ॥
जो त्रिणाचिकेत विद्वान् अग्निके इस त्रयको [ यानी कौन ईंटें हों, कितनी संख्यामें हों और किस प्रकार अग्निचयन किया जाय—इसको ] जानकर नाचिकेत अग्निका चयन करता है वह देहपातसे पूर्व ही मृत्युके बन्धनोंको तोड़कर शोकसे पार हो स्वर्ग लोकमें आनन्दित होता है ॥ १८ ॥
| त्रिणाचिकेतस्त्रयं यथोक्तं या इष्टका यावतीर्वा यथा वेत्येतद् विदित्वावगत्य यश्चैवमात्मरूपेण अग्निं विद्वांश्चिनुते निर्वर्तयति नाचिकेतमग्निं क्रतुं स मृत्युपाशान् अधर्माज्ञानरागद्वेषादिलक्षणान् पुरतः अग्रतः पूर्वमेव शरीरपातात् इत्यर्थः, प्रणोद्यापहाय शोकातिगो मानसैर्दुःखैर्वर्जित इत्येतत् मोदते स्वर्गलोके वैराजे विराडात्मस्वरूपप्रतिपत्त्या ॥ १८॥ | जो त्रिणाचिकेत अग्निके पूर्वोक्त त्रयको जानकर अर्थात् जो ईंटे होनी चाहिये, जितनी होनी चाहिये तथा जिस प्रकार अग्नि चयन करना चाहिये—इन तीनों बातोंको समझकर उस अग्निको आत्मस्वरूप-से जाननेवाला जो विद्वान् अग्नि—क्रतुका चयन करता—साधन करता है वह अधर्म, अज्ञान और राग-द्वेषादिरूप मृत्युके बन्धनोंको पुरतः—अग्रतः अर्थात् देहपातसे पूर्व ही अपनोदन—त्याग करके शोकसे पार हुआ अर्थात् मानसिक दुःखोंसे मुक्त हुआ स्वर्गमें यानी वैराज-लोकमें विराडात्मस्वरूपकी प्राप्ति होनेसे आनन्दित होता है ॥ १८ ॥ |