कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
पृष्ठ 37, कुल 182 में से
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वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५
एष तेऽग्निर्नचिकेतः स्वर्ग्यो
यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण ।
एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनास-
स्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १९ ॥
हे नचिकेतः ! तूने द्वितीय वरसे जिसे वरण किया था वह यह स्वर्गका साधनभूत अग्नि तुझे बतला दिया । लोग इस अग्निको तेरा ही कहेंगे । हे नचिकेतः ! तू तीसरा वर और माँग ले ॥ १९ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एष ते तुभ्यमग्निर्वरो हे नचिकेतः स्वर्ग्यः स्वर्गसाधनो यमग्निं वरमवृणीथाः प्रार्थितवानसि द्वितीयेन वरेण सोऽग्निर्वरो दत्त इत्युक्तोपसंहारः । किञ्च तमग्निं तवैव नाम्ना प्रवक्ष्यन्ति जनासो जना इत्येतत् । एष वरो दत्तो मया चतुर्थस्तुष्टेन । तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व । तस्मिन्ह्यदत्त ऋणवानहमित्यभिप्रायः ॥१९॥ | हे नचिकेतः ! अपने दूसरे वरसे तूने जिस अग्निका वरण किया था—जिसके लिये तूने प्रार्थना की थी वह स्वर्गप्राप्तिका साधनभूत यह अग्निविज्ञानरूप वर मैंने तुझे दे दिया । इस प्रकार उपर्युक्त अग्निविज्ञानका उपसंहार कहा गया । यही नहीं, लोग इस अग्निको तेरे ही नामसे पुकारेंगे । यह तुझसे प्रसन्न हुए मैंने तुझे चौथा वर दिया था । हे नचिकेतः ! अब तू तीसरा वर और माँग ले, क्योंकि उसे बिना दिये मैं ऋणी ही हूँ—ऐसा इसका अभिप्राय है ॥ १९ ॥ |
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एतावद्ध्यतिक्रान्तेन विधिप्रतिषेधार्थेन मन्त्रब्राह्मणेनावगन्तव्यं यद्वरद्वयसूचितं वस्तु । | विधि-प्रतिषेध ही जिसके प्रयोजन हैं ऐसे उपर्युक्त मन्त्र-ब्राह्मणद्वारा इन दो वरोंसे सूचित इतनी ही वस्तु ज्ञातव्य है । |