भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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पृष्ठ 38

२६ कठोपनिषद् [ अध्याय १

न आत्मतत्त्वविषययाथात्म्यविज्ञानम्। अतो विधिप्रतिषेधार्थविषयस्यात्मनि क्रियाकारकफलाध्यारोपलक्षणस्य स्वाभाविकस्याज्ञानस्य संसारबीजस्य निवृत्त्यर्थं तद्विपरीतब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानं क्रियाकारकफलाध्यारोपणलक्षणशून्यम् आत्यन्तिकनिःश्रेयसप्रयोजनं वक्तव्यमिति उत्तरो ग्रन्थ आरभ्यते। तमेतमर्थं द्वितीयवरप्राप्त्याप्यकृतार्थत्वं तृतीयवरगोचरमात्मज्ञानमन्तरेण इत्याख्यायिकया प्रपञ्चयति— यतः पूर्वस्मात्कर्मगोचरात्साध्यसाधनलक्षणादनित्याद्विरक्तस्य आत्मज्ञानेऽधिकार इति तन्निन्दार्थं पुत्राद्युपन्यासेन प्रलोभनं क्रियते।<br><br>नचिकेता उवाच तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्वेत्युक्तः सन्—आत्मतत्त्वविषयक यथार्थ ज्ञान इसका विषय नहीं है। अत्र, जो विधि-प्रतिषेधका विषय है, आत्मामें क्रिया, कारक और फलका अध्यारोप करना ही जिसका लक्षण है तथा जो संसारका बीजस्वरूप है उस स्वाभाविक अज्ञानकी निवृत्तिके लिये उससे विपरीत ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञान कहना है, जो कि क्रिया, कारक और फलके अध्यारोपरूप लक्षणसे शून्य और आत्यन्तिक निःश्रेयसरूप प्रयोजनवाला है; इसीके लिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है। इसी बातको आख्यायिकाद्वारा विस्तृत करते हैं कि तीसरे वरसे प्राप्त होनेवाले आत्मज्ञानके बिना द्वितीय वरकी प्राप्तिसे भी अकृतार्थता ही है। क्योंकि आत्मज्ञानमें उसी पुरुषका अधिकार है जो पूर्वोक्त कर्मविषयक साध्य-साधनलक्षण एवं अनित्य फलोंसे विरक्त हो गया हो। इसलिये उनकी निन्दाके लिये पुत्रादिके उपन्याससे नचिकेताको प्रलोभित किया जाता है।<br><br>'हे नचिकेता : ! तुम तीसरा वर माँग लो' इस प्रकार कहे जानेपर नचिकेता बोला—