कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
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वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
द्वितीया वल्ली
श्रेय-प्रेयविवेक
| परीक्ष्य शिष्यं विद्यायोग्यतां चावगम्याह— | इस प्रकार शिष्यकी परीक्षा कर और उसमें विद्या-ग्रहणकी योग्यता जान यमराजने कहा— |
|---|
अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेय-
स्ते उभे नानार्थे पुरुषँ सिनीतः ।
तयोः श्रेय आददानस्य साधु-
र्भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥ १ ॥
श्रेय (विद्या) और है तथा प्रेय (अविद्या) और ही है। वे दोनों विभिन्न प्रयोजनवाले होते हुए ही पुरुषको बाँधते हैं। उन दोनोंमेंसे श्रेयको ग्रहण करनेवालेका शुभ होता है और जो प्रेयको वरण करता है वह पुरुषार्थसे पतित हो जाता है ॥ १ ॥
| संस्कृत भाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| अन्यत्पृथगेव श्रेयो निःश्रेयसं तथान्यदुताप्येव प्रेयः प्रियतरमपि । ते प्रेयःश्रेयसी उभे नानार्थे भिन्नप्रयोजने सती पुरुषमधिकृतं वर्णाश्रमादिविशिष्टं सिनीतो बध्नीतस्ताभ्यामात्मकर्त्तव्यतया प्रयुज्यते सर्वः पुरुषः। श्रेयःप्रेयसोर्ह्यभ्युदयामृतत्वार्थी | श्रेय अर्थात् निःश्रेयस अन्यत्—भिन्न ही है तथा प्रेय यानी प्रियतर वस्तु भी अन्य ही है। वे श्रेय और प्रेय दोनों विभिन्न प्रयोजनवाले होनेपर भी अधिकारी यानी वर्णाश्रमादिविशिष्ट पुरुषका बन्धन कर देते हैं; अर्थात् सब लोग उन्हींके द्वारा अपने [विद्या-अविद्यासम्बन्धी] कर्त्तव्यसे युक्त हो जाते हैं। अभ्युदयकी इच्छावाला पुरुष प्रेयसे और अमृतत्वका |