कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 52, कुल 182 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४० | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| पुरुषः प्रवर्तते। अतः श्रेयःप्रेयः-प्रयोजनकर्तव्यतया ताभ्यां बद्ध इत्युच्यते सर्वः पुरुषः। <br><br> ते यद्यप्येकैकपुरुषार्थसम्बन्धिनौ विद्याविद्यारूपत्वाद्विरुद्धे इत्यन्यतरापरित्यागेनैकेन पुरुषेण सहानुष्ठातुमशक्यत्वात् तयोर्हित्वाविद्यारूपं प्रेयः श्रेय एव केवलमाददानस्योपादानं कुर्वतः साधु शोभनं शिवं भवति। यस्त्वदूरदर्शी विमूढो हीयते वियुज्यतेऽस्मादर्थात् पुरुषार्थात् पारमार्थिकात्प्रयोजनान्नित्यात् प्रच्यवत इत्यर्थः। कोऽसौ य उ प्रेयो वृणीत उपादत्त इत्येतत् ॥ १ ॥ | इच्छुक श्रेयसे प्रवृत्त होता है। अतः श्रेय और प्रेय इन दोनोंके प्रयोजनोंकी कर्तव्यताके कारण सब लोग उनसे बद्ध कहे जाते हैं। <br><br> वे यद्यपि एक-एक पुरुषार्थसे सम्बन्ध रखनेवाले हैं तो भी विद्या और अविद्यारूप होनेके कारण परस्पर विरुद्ध हैं, अतः एकका परित्याग किये बिना एक पुरुषद्वारा उन दोनोंका साथ-साथ अनुष्ठान न हो सकनेके कारण उनमेंसे अविद्यारूप प्रेयको छोड़कर केवल श्रेयको ही स्वीकार करनेवालेका साधु—शुभ यानी कल्याण होता है। जो मूढ़ दूरदर्शी नहीं है वह इस अर्थ—पुरुषार्थ अर्थात् परमार्थसम्बन्धी नित्य प्रयोजनसे च्युत हो जाता है; वह कौन है? वही जो कि प्रेयको वरण करता है—यह इसका तात्पर्य है ॥ १ ॥ |
| यद्युभे अपि कर्तुं स्वायत्ते पुरुषेण किमर्थं प्रेय एवादत्ते बाहुल्येन लोक इत्युच्यते— | यदि श्रेय और प्रेय इन दोनोंहीका करना मनुष्यके स्वाधीन है तो लोग अधिकतासे प्रेयको ही क्यों स्वीकार करते हैं? इसपर कहा जाता है— |