कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | व० | मं० | पृ० |
( २ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | व० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|---|
| ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य ... | १ | ३ | १ | ७२ |
| एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा ... | २ | २ | १२ | १२९ |
| एतच्छ्रुत्वा संपरिगृह्य ... | १ | २ | १३ | ५६ |
| एतत्तुल्यं यदि मन्यसे ... | १ | १ | २४ | ३१ |
| एतदालम्बन ँश्रेष्ठम् ... | १ | २ | १७ | ५९ |
| एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म ... | १ | २ | १६ | ५९ |
| एष तेऽग्निर्नचिकेतः ... | १ | १ | १९ | २५ |
| एष सर्वेषु भूतेषु ... | १ | ३ | १२ | ८४ |
| कामस्याप्तिं जगतः ... | १ | २ | ११ | ५३ |
| जानाम्यहँ शेवधिः ... | १ | २ | १० | ५२ |
| तँह कुमारँसन्तम् ... | १ | १ | २ | ७ |
| तदेतदिति मन्यन्ते ... | २ | २ | १४ | १३२ |
| तमब्रवीत्प्रीयमाणः ... | १ | १ | १६ | २१ |
| तं दुर्दर्शं गूढम् ... | १ | २ | १२ | ५४ |
| तां योगमिति मन्यन्ते ... | २ | ३ | ११ | १४९ |
| तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीः ... | १ | १ | ९ | १४ |
| त्रिणाचिकेतस्त्रयम् ... | १ | १ | १८ | २४ |
| त्रिणाचिकेतस्त्रिभिः ... | १ | १ | १७ | २२ |
| दूरमेते विपरीते ... | १ | २ | ४ | ४३ |
| देवैरत्रापि विचिकित्सितम् ... | १ | १ | २१ | २८ |
| ,, ... | ,, | ,, | २२ | २९ |
| न जायते म्रियते वा ... | १ | २ | १८ | ६० |
| न तत्र सूर्यो भाति ... | २ | २ | १५ | १३३ |
| न नरेणावरेण ... | १ | २ | ८ | ४८ |
| न प्राणेन नापानेन ... | २ | २ | ५ | १२१ |
| न वित्तेन तर्पणीयः ... | १ | १ | २७ | ३४ |
| न संदृशे तिष्ठति ... | २ | ३ | ९ | १४७ |
| न सांपरायः प्रतिभाति ... | १ | २ | ६ | ४५ |
| नाचिकेतमुपाख्यानम् ... | १ | ३ | १६ | ९२ |
| नायमात्मा प्रवचनेन ... | १ | २ | २३ | ६८ |
| नाविरतो दुश्चरितात् ... | १ | २ | २४ | ६९ |
| नित्योऽनित्यानाम् ... | २ | २ | १३ | १३१ |
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | व० | मं० | पृ० |
( ३ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | व० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|---|
| नैव वाचा न मनसा | २ | ३ | १२ | १५२ |
| नैषा तर्केण मतिः | १ | २ | ९ | ५० |
| पराचः कामाननुयन्ति | २ | १ | २ | ९७ |
| पराञ्चि खानि व्यतृणत् | २ | १ | १ | ९४ |
| पीतोदका जग्धतृणा | १ | १ | ३ | ८ |
| पुरमेकादशद्वारम् | २ | २ | १ | ११४ |
| प्र ते ब्रवीमि तदु | १ | १ | १४ | १९ |
| बहूनामेमि प्रथमः | १ | १ | ५ | १० |
| भयादस्याग्निस्तपति | २ | ३ | ३ | १४१ |
| मनसैवेदमाप्तव्यम् | २ | १ | ११ | १०८ |
| महतः परमव्यक्तम् | १ | ३ | ११ | ८२ |
| मृत्युप्रोक्तां नाचकेतः | २ | ३ | १८ | १६१ |
| य इमं परमम् | १ | ३ | १७ | ९३ |
| य इमं मध्वदम् | २ | १ | ५ | १०२ |
| य एष सुप्तेषु जागर्ति | २ | २ | ८ | १२४ |
| यच्छेद्वाङ्मनसी | १ | ३ | १३ | ८६ |
| यतश्चोदेति सूर्यः | २ | १ | ९ | १०६ |
| यथादर्शे तथा | २ | ३ | ५ | १४३ |
| यथा पुरस्ताद्भविता | १ | १ | ११ | १६ |
| यथोदकं दुर्गे वृष्टम् | २ | १ | १४ | १११ |
| यथोदकं शुद्धे शुद्धम् | २ | १ | १५ | ११२ |
| यदा पञ्चावतिष्ठन्ते | २ | ३ | १० | १४९ |
| यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते | २ | ३ | १५ | १५७ |
| यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते | २ | ३ | १४ | १५५ |
| यदिदं किं च जगत्सर्वम् | २ | ३ | २ | १४० |
| यदेवेह तदमुत्र | २ | १ | १० | १०७ |
| यस्तु विज्ञानवान् | १ | ३ | ६ | ७८ |
| ” | १ | ३ | ८ | ७९ |
| यस्त्वविज्ञानवान् | १ | ३ | ५ | ७७ |
| ” | १ | ३ | ७ | ७९ |
| यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति | १ | १ | २९ | ३७ |
| यस्य ब्रह्म च क्षत्रम् | १ | २ | २५ | ७० |
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | व० | मं० | पृ० |
( ४ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | व० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|---|
| यः पूर्वं तपसः | २ | १ | ६ | १०३ |
| यः सेतुरीजानानाम् | १ | ३ | २ | ७४ |
| या प्राणेन संभवति | २ | १ | ७ | १०४ |
| येन रूपं रसम् | २ | १ | ३ | ९९ |
| येयं प्रेते विचिकित्सा | १ | १ | २० | २७ |
| ये ये कामा दुर्लभाः | १ | १ | २५ | ३१ |
| योनिमन्ये प्रपद्यन्ते | २ | २ | ७ | १२३ |
| लोकादिमग्निम् | १ | १ | १५ | २० |
| वायुर्यथैको भुवनम् | २ | २ | १० | १२७ |
| विज्ञानसारथिर्यस्तु | १ | ३ | ९ | ८० |
| वैश्वानरः प्रविशति | १ | १ | ७ | १२ |
| शतं चैका च हृदयस्य | २ | ३ | १६ | १५९ |
| शतायुषः पुत्रपौत्रान् | १ | १ | २३ | ३० |
| शान्तसंकल्पः सुमनाः | १ | १ | १० | १५ |
| श्रवणायापि बहुभिः | १ | २ | ७ | ४७ |
| श्रेयश्च प्रेयश्च | १ | २ | २ | ४१ |
| श्वोभावा मर्त्यस्य | १ | १ | २६ | ३३ |
| स त्वमग्निꣳस्वर्ग्यम् | १ | १ | १३ | १८ |
| स त्वं प्रियान्प्रियरूपाꣳश्च | १ | २ | ३ | ४२ |
| सर्वे वेदा यत्पदम् | १ | २ | १५ | ५८ |
| सह नाववतु | २ | ३ | १९ | १६३ |
| स होवाच पितरम् | १ | १ | ४ | ९ |
| सूर्यो यथा सर्वलोकस्य | २ | २ | ११ | १२७ |
| स्वप्नान्तं जागरितान्तम् | २ | १ | ४ | १०१ |
| स्वर्गे लोके न भयम् | १ | १ | १२ | १७ |
| हꣳसः शुचिषद्वसुः | २ | २ | २ | ११६ |
| हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि | २ | २ | ६ | १२२ |
| हन्ता चेन्मन्यते | १ | २ | १९ | ६२ |
॥ श्रीहरिः ॥
गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित विभिन्न गीताएँ
(१) श्रीमद्भगवद्गीता-तत्त्व-विवेचनी—(टीकाकार—श्रीजयदयालजी गोयन्दका)
गीता-विषयक २५१५ प्रश्न और उनके उत्तररूपमें
विवेचनात्मक टीकाके कई संस्करण—
(क) बृहदाकार—मोटे टाइपोंमें।
(ख) ग्रन्थाकार—विशेष संस्करण।
(ग) ग्रन्थाकार—सामान्य संस्करण।
(घ) संस्कृतमें श्लोक, अंग्रेजीमें व्याख्या।
(२) गीता-साधक-संजीवनी—(टीकाकार—स्वामी श्रीरामसुखदासजी) गीताके मर्मको समझने-हेतु व्याख्यात्मक शैली एवं सरल, सुबोध भाषामें टीका—
(क) बृहदाकार—मोटे टाइपोंमें हिन्दी।
(ख) ग्रन्थाकार—विशेष संस्करण हिन्दी।
(ग) पाकेट साइज—दो खण्डोंमें हिन्दी।
(घ) ग्रन्थाकार—मराठी अनुवाद।
(ङ) ग्रन्थाकार—गुजराती अनुवाद।
(च) ग्रन्थाकार—अंग्रेजी अनुवाद।
(छ) ग्रन्थाकार—बँगला अनुवाद (अध्याय १ से १२ तक)।
(३) गीता-दर्पण—(स्वामी श्रीरामसुखदासजीद्वारा) गीताके तत्त्वोंपर प्रकाश, लेख, गीता-व्याकरण और छन्द-सम्बन्धी गूढ-विवेचन, सचित्र, सजिल्द।
इस पुस्तकका ग्रन्थाकार हिन्दी, मराठी, बँगला तथा गुजराती संस्करण भी उपलब्ध है।
(४) गीता-शांकरभाष्य—गीतापर आचार्य शंकरका भाष्य।
(५) गीता-माधुर्य—स्वामी श्रीरामसुखदासजीद्वारा सरल प्रश्नोत्तर शैलीमें हिन्दी, तमिल, कन्नड़, मराठी, गुजराती, उर्दू, नेपाली, बँगला, असमिया एवं अंग्रेजी अनुवाद भी उपलब्ध है।
(६) गीता-चिन्तन—(ले०—श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार)।
(७) श्रीमद्भगवद्गीता-पदच्छेद (मूल, अन्वय, भाषाटीकासहित) हिन्दी, गुजराती, बँगला, मराठी।
(८) श्रीमद्भगवद्गीता—(श्लोक, अर्थ तथा प्रत्येक अध्यायके माहात्म्यसहित) हिन्दी, मराठीमें उपलब्ध।
(९) श्रीमद्भगवद्गीता—(सटीक) मोटे अक्षरोंमें आकर्षक बहुरंगा आवरणसहित।
(१०) श्रीमद्भगवद्गीता—केवल भाषा।
(११) श्रीमद्भगवद्गीता—भाषाटीका गुटका (हिन्दी, अंग्रेजी एवं बँगला)।
(१२) श्रीपञ्चरत्नगीता—गीता, विष्णुसहस्रनाम, भीष्मस्तवराज, अनुस्मृति, गजेन्द्रमोक्ष (मोटे अक्षरोंमें, केवल मूल पाठ)।
(१३) गीता मूल विष्णुसहस्रनामसहित—(नित्य-स्तुतिसहित विशेष संस्करण)।
(१४) गीता रोमन—संस्कृतमें श्लोक, रोमनमें मूल एवं अंग्रेजी अनुवाद।
(१५) गीता ताबीजी मूल—
(क) माचिस-आकारमें।
(ख) सम्पूर्ण गीता एक पत्रेमें।
(१६) गीता-ज्ञान-प्रवेशिका—गीता-व्याकरणका ज्ञान करानेवाली शोधपरक पुस्तक।
(१७) गीता-दैनन्दिनी—सम्पूर्ण गीता एवं अनेक उपयोगी सूचनाएँ और जीवनोपयोगी सूत्र (दो आकार, तीन प्रकारमें) पुस्तकाकार, पाकेट साइज, प्लास्टिक-आवरण एवं कपड़ेके आवरणमें।
॥ श्रीहरिः ॥
गीताप्रेस, गोरखपुरसे
प्रकाशित
उपनिषद्
| उपनिषद् | विवरण |
|---|---|
| ईशादि नौ उपनिषद् | अन्वय, हिंदी व्याख्यासहित |
| बृहदारण्यकोपनिषद् | हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित |
| छान्दोग्योपनिषद् | हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित |
| ईशावास्योपनिषद् | हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित |
| केनोपनिषद् | हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित |
| कठोपनिषद् | हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित |
| माण्डूक्योपनिषद् | हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित |
| मुण्डकोपनिषद् | हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित |
| प्रश्नोपनिषद् | हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित |
| तैत्तिरीयोपनिषद् | हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित |
| ऐतरेयोपनिषद् | हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित |
| श्वेताश्वतरोपनिषद् | हिंदी अनुवाद शांकरभाष्यसहित |