कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम लम्बक १५ दैववश भोगवर्मा ने पत्र को पढ़कर एकान्त में शिववर्मा से उसके वध की बात सुना दी ॥६९॥ मन्त्रिवर शिववर्मा ने भोगवर्मा से कहा कि तुम निर्देश के अनुसार मुझे मारो। यदि नहीं मारोगे तो मैं स्वयं आत्मघात कर लूँगा ॥७० ॥ यह सुनकर आश्चर्यचकित भोगवर्मा ने शिववर्मा से कहा कि 'हे मित्र ! यह क्या रहस्य है मुझे बताओ। यदि नहीं बताओगे तो मैं तुम्हें शपथ देता हूँ' ॥७१॥ राजा के आग्रह करने पर मन्त्री ने कहा कि 'हे राजन् ! मैं जिस देश में मारा जाऊँगा वहाँ बारह वर्षों तक वृष्टि न होगी—अकाल पड़ेगा' ॥७२॥ यह सुनकर भोगवर्मा चकित होकर अपने मन्त्रियों के साथ सोचने लगा कि आदित्यवर्मा दुष्ट है। वह हमारे देश का विनाश चाहता है ॥७३॥ क्या उसके यहाँ गुप्त हत्या करनेवाले बधिक नहीं हैं। इसलिए मंत्री की रक्षा करनी चाहिए। भले ही आत्महत्या हो जाय किन्तु इसका वध कदापि न किया जायगा ॥७४॥ इस प्रकार मन्त्री शिववर्मा अपनी बुद्धि से जीवित ही लौट आया उसकी निर्दोष- ता दूसरे प्रकार से सिद्ध हो गई। यश कभी विपरीत नहीं होता यश सहायक ही होता है ॥७५-७६॥ वात्स्यायन इसी प्रकार तुम्हारी भी शुद्धि होगी। अर्थात् निर्दोषता प्रमाणित हो जायगी और राजा पश्चात्ताप करेगा ॥७७॥ शर्वदत्त से इस प्रकार कहा हुआ मैं उसी घर में छिपा रहा और अवसर की प्रतीक्षा करता रहा। वे दिन मैंने अत्यन्त कठिनाई से व्यतीत किए ॥७८॥ मित्रद्रोह का फल एक बार उस पाण्ड्य का पुत्र विक्रमतुंग शिकार खेलने के लिए सदा से गया। घोड़े की तेज दौड़ने के कारण राजपुत्र अति दूर गहन वन में पहुँच गया। उस अकेले भ्रमण करने-डरने दिन समाप्त हुआ ॥७९॥ राजपुत्र उस रात को बिताने के लिए एक उपयुक्त पेड़ पर चढ़ गया। कुछ ही समय के अनन्तर सिंह से डराया हुआ एक भालू भी उसी वृक्ष पर आ चढ़ा॥८०॥ भालू राजपुत्र को घबड़ाया हुआ देखकर मनुष्य की भाषा में बोला—'राजपुत्र तू मेरा मित्र है। डर मत। मैं कष्टदायक नहीं। ऐसा कहकर उसने राजपुत्र के हृदय पर अपना विश्वास जमा दिया और उसे निर्भय कर दिया॥८१-८२ ॥ भालू की बातों से विश्वस्त होकर राजपुत्र का भय और श्रम उपशम हुआ। इतने में नीचे से सिंह बोला॥८३॥