कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम लम्बक ७७ यह सुनकर धूतार्था ने एकान्त में उस नागकुमार का स्मरण किया। नागकुमार स्मरण करते ही आया और वत्स एवं गुल्म से बोला ॥१६॥ इस शापभ्रष्टा अप्सरा को मैंने पत्नी बनाया है जो तुम दोनों की बहन है। तुम दोनों भी शाप के कारण पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए हो ॥१७॥ तुम्हारी बहन के इस गर्भ से अवश्य पुत्र उत्पन्न होगा। इसके उत्पन्न होने पर इसकी और तुम दोनों की शाप-मुक्ति होगी ॥१८॥ ऐसा कहकर वह नागकुमार अन्तर्धान हो गया और कुछ ही दिनों बाद धूतार्था का पुत्र उत्पन्न हुआ। हे सखे वह धूतार्था का पुत्र मुझे ही समझो ॥१९॥ मेरे उत्पन्न होते ही आकाशवाणी हुई कि यह गुणाढ्य नामक ब्राह्मण शिवजी के गण का अवतार है ॥२०॥ मेरे उत्पन्न होने पर वे—मेरी माता और मामा—भी शापहीन होने के कारण मर गये और एकाकी मैं अधीर हो गया ॥२१॥ कुछ दिनों के अनन्तर धाय का परित्याग करके मैं बालक होने पर भी अपने ही सहारे विद्याओं की प्राप्ति के लिए दक्षिणापथ चला गया ॥२२॥ मैं कुछ समय में दक्षिण देश में समस्त विद्याओं को प्राप्त करके प्रसिद्ध विद्वान् हुआ और अपने गुणों को दिखाने की इच्छा से स्वदेश आया ॥२३॥ बहुत दिनों के अनन्तर शिष्यों के साथ उस सुप्रतिष्ठित नगर में प्रवेश करते हुए मैंने नगर की अपूर्व शोभा देखी ॥२४॥ मैंने उस नगर में देखा कि कहीं सामवेदी विद्वान् विधिपूर्वक साम-गान कर रहे हैं और कहीं वेदों के अर्थ-निर्णय पर विद्वानों का शास्त्रार्थ हो रहा है ॥२५॥ कहीं जुआरी अपनी डींग हांक रहे थे कि जो जुए की कला जानता है, उसके हाथ में खजाना है ॥२६॥ अपनी-अपनी व्यापार-कला का चातुर्य बतलाते हुए कुछ बनियों की मंडली में एक बनिया इस प्रकार बोला ॥२७॥ चूहे से धनी बने सेठ की कथा 'पैसों के विषय में संयम रखनेवाला ही पैसा कमाता है' यह कितने आश्चर्य की बात है। मैं जब गर्भ में था तभी मेरे पिता मर गये। मेरी माता के पास जो कुछ भी धन था वह दुष्ट संबंधियों ने उसे फुसलाकर ले लिया ॥२८ १ ॥