कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
DevanagariHindipublished876 पृष्ठ
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- १८ - रूपान्तर किया था।१ न केवल भारतवर्ष वरन् बृहत्तर भारत के द्वीपान्तरों में भी गुणाढ्य का यश छा गया था। कम्बोज के महाराज यशोवर्मन् के लेखों में तीन बार गुणाढ्य का उल्लेख आया है जहाँ उसे प्राकृतप्रिय विशेषण दिया गया है। बारहवीं शती तक यह ग्रन्थ विद्यमान था और उसके बाद उसका कोई चिह्न शेष न रहा यह आश्चर्य की बात है। हो सकता है कि सोमदेव की अद्भुत सफलता ने गुणाढ्य को नामशेष करा दिया। धन्वन् के अनुसार गुणाढ्य का जन्म गोदावरी के किनारे प्रतिष्ठान नगर में हुआ था। सोमदेव से भी इसका समर्थन होता है। यह शातवाहन वंश के सम्राट् हाल या शालिवाहन की राजधानी थी। विद्वाना के अनुसार शालिवाहन या सातवाहन प्रथम शती ईसवी में हुए। साकल का अनुमान है कि गुणाढ्य का जन्म मथुरा में हुआ था बाद में वे उज्जयिनी या कौशाम्बी में जाकर रहने लग गये । बुधस्वामिन् का बृहत्कथाश्लोकसंग्रह बृहत्कथा की नेपाली वाचना कहलाती है। इसमें अट्ठाईस सर्गों में लगभग ४५३९ श्लोक हैं। या तो मूल में ही यह ग्रंथ अधूरा रह गया या इस समय त्रुटित मिला है। इसमें नरवाहनदत्त अपने अट्ठाईस विवाहों में से केवल छः की कथा कह पाया है। यदि इसी दर पर सारी कथा कही जाती तो लगभग १९ हजार श्लोकों में पूरी कहानी का फैलाव होता और नरवाहनदत्त के राज्य-विस्तार और अभिषेक की कथा मिलाकर इसमें लग भग २५ सहस्र श्लोकों का विस्तार बैठता और सर्गों की संख्या भी १ म कम न होती। काव्य के आरम्भ में उज्जयिनी की प्रशंसा और वहाँ के शासक महासेन प्रद्योत की मृत्यु का उल्लेख है। उसके बाद उसका पुत्र गोपाल गद्दी पर बैठा किन्तु पितृहन्ता होने के अपयश से उसने राज्य छोड़ दिया और उसका भाई पालक राजा हुआ। उसने भी राज्य त्याग दिया और गोपाल का पुत्र अवन्तिवर्धन सिंहासन पर बैठा। उसके उपरान्त सुरतमंजरी के साथ उसके प्रेम की कथा आती है और चौथे सर्ग से नरवाहनदत्त की प्रेम-कहानियाँ ग्रंथ में स्थान घेरती हैं। बुधस्वामिन् भी कोई कम प्रतिभाशाली लेखक न था। उसने लगभग पाँचवीं शताब्दी में अपने ग्रंथ की रचना की और गुप्त वंश की स्वर्ण-संस्कृति की अनेक संस्थाओं के वातावरण में प्रवाहमयी संस्कृत-शैली में ग्रंथ का निर्माण किया। बुधस्वामिन् के बाद संस्कृत-वाचना की प्राप्ति न होकर संघदासगणि-कृत वसुदेव हिण्डी की प्राकृत-वाचना ही अबतक प्राप्त हुई है जिसके संबंध में आवश्यक विवरण ऊपर दिया जा चुका है और जिसने बृहत्कथा के ढके हुए पदों का उद्घाटन करने में पर्याप्त योग दिया है। इसके अनन्तर क्षेमेन्द्र-कृत बृहत्कथामंजरी का स्थान आता है। क्षेमेन्द्र काश्मीर के राजा अनन्त (१०२९ १ ९०) की सभा के सभासद थे। उनका दूसरा नाम व्यासदास था। उन्होंने
१ शब्दानुशासनकारेण दैवभारतीनिबद्धकवेन किरातार्जुनीये पंचदशसर्गटीकाकारेण दुर्विनीतनामधेयेन, [मैसूर पुरातत्त्व-विभाग की वार्षिक रिपोर्ट १९१२ पृष्ठ ३५ ३९ Indian Antiquary ४२।२ ४ JRAS १९१३ १८९।]