कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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रामायण और महाभारत का संक्षेप भी रामायणमंजरी और भारतमंजरी नामक ग्रंथों में किया। उनका अवदानकल्पलता ग्रंथ भी प्रसिद्ध है। कला-विलास देशोपदेश नर्ममाला और समय मातृका ग्रंथों में क्षेमेन्द्र की प्रतिभा का उत्कृष्ट रूप प्राप्त होता है। क्षेमेन्द्र-कृत बृहत्कथामंजरी में १८ लम्बक हैं और उनके नाम भी सोमदेव के लम्बकों से मिलते हैं। बृहत्कथा की अंतिम वाचना सोमदेव-कृत कथासरित्सागर है। सोमदेव ने अपनी प्रारंभिक प्रतिज्ञा में कहा है— 'मेरे सामने जैसा मूल था वैसा ही मैंने यह ग्रंथ रचा है। तनिक-सा फेर-फार भी नहीं किया। हाँ केवल औचित्य और एक दूसरे के साथ अन्वय या जोड़ मिलाने का ध्यान यथाशक्ति रक्खा गया है। इसमें काव्य का अंश मैंने इतना ही जोड़ा है जिससे कहानी के रस का विघात न हो। पांडित्य के यश के लोभ से मेरा यह प्रयत्न नहीं है। मेरा उद्देश्य यह है कि अनेक कथाओं का समूह सरलता से स्मृति में रक्खा जा सके।' कथा की उत्पत्ति के संबंध में सोमदेव ने लिखा है—'एक बार शिव ने पार्वती से सात विद्याधर चक्रवर्तियों की आश्चर्यमयी कथाओं का वर्णन किया। यद्यपि शिव की वार्ता एकान्त में हुई थी किन्तु उनके अनुचर पुष्पदन्त ने वे कहानियां सुन लीं और अपनी पत्नी जया को उन्हें सुना दिया। जया ने उन कहानियों को अपनी सहेलियों से कहा। जब यह बात पार्वतीजी के कान में पड़ी तो उन्होंने रुष्ट होकर पुष्पदन्त को मर्त्यलोक में जन्म लेने का शाप दिया। पुष्पदन्त के भाई माल्यवान् ने उसकी ओर से क्षमायाचना की तो उसे भी वैसा ही दंड मिला। पुष्पदन्त की पत्नी जया पार्वतीजी की परिचारिका थी। जब पार्वतीजी ने अपनी सखी को शोक से दुःखी देखा तो उन्हें करुणा आ गई और उन्होंने अपने शाप का परिहार करते हुए कहा कि पुष्पदन्त का विन्ध्य पर्वत में काणभूति नामक एक पिशाच से मिलना होगा। उसे अपने पूर्व जन्मों की स्मृति बनी रहेगी और जब वह काणभूति को ये कथाए सुनायेगा तब उसकी शाप-मुक्ति होगी। माल्यवान् भी जब काणभूति से इन बृहत्कथाओं को सुनकर लोक में इनका प्रचार कर चुकेगा तब वह पुनः स्वर्ग में लौट आएगा। इस विधान के अनुसार पुष्पदन्त ने कौशाम्बी में वररुचि-कात्यायन के रूप में जन्म लिया और वह महान् वैयाकरण एवं नन्द-वंश के अंतिम राजा योगानन्द का मंत्री हुआ। अंत में वह वनवासी हो गया और विन्ध्याचल की विन्ध्यवासिनी देवी की यात्रा में काणभूति से उसकी भेंट हुई। तब उसे अपने पूर्व जन्म की स्मृति हुई और उसने काणभूति को वे सात
१ यथामूलं तथैवैतन्न मनागप्यतिक्रमः। ग्रन्थविस्तरसंक्षेपमात्रं भाषा च भिद्यते॥ औचित्यान्वयरक्षा च यथाशक्ति विधीयते। कथारसाविघातेन काव्यांशस्य च योजना॥ वैदग्ध्यख्यातिलोभाय मम नैवायमुद्यमः। किन्तु नाना कथाजालस्मृतिसौकर्यसिद्धये॥ कथासरित्सागर १।१०-१२।