भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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द्वितीय लम्बक १७३ उदयन के सन्देश को सुनकर चंडमहासेन ने सोचा—कि वह आत्माभिमानी वत्सराज उदयन यहाँ आना नहीं चाहता। मैं भी कन्या को उसके यहाँ नहीं भेज सकता। इसमें मेरी लघुता होगी। इसीलिए चतुराई से कैद कर ही उसे यहाँ बुलाता हूँ—ऐसा सोचकर चंड महासेन ने मन्त्रियों से मन्त्रणा करके अपने हाथी नडागिरि के समान ही एक यन्त्रमय हाथी बनवाया। उसके पेट में योग्य योद्धाओं को छिपाकर उसे विन्ध्याचल के घोर जंगल में रखवा दिया॥२—५॥ राजा उदयन के शिकारी भृत्यों ने जंगल में घूमते हुए उस यन्त्र-हस्ती को दूर से देखा और राजा उदयन से निवेदन किया—'महाराज हमने विन्ध्यारण्य में घूमता हुआ एक महान् हाथी देखा है। ऐसा हाथी इस विशाल भूमण्डल में नहीं देखा गया। लम्बे-चौड़े एवं विशाल- काय वह जंगम विन्ध्य पर्वत के समान आकाश में व्याप्त हो रहा है'। शिकारी गुप्तचरों की बात सुनकर राजा उदयन अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उसने उन्हें सुवर्ण-मुद्राओं के पुरस्कार देकर विदा किया॥६—९॥ और सोचा कि मैं नडागिरि के समान उस हाथी को यदि प्राप्त कर लूँगा तो चंडमहासेन अवश्य मेरे वश में आयेगा और स्वयं ही मुझे वासवदत्ता को प्रदान करेगा। इस प्रकार सोचते हुए राजा ने किसी प्रकार रात्रि व्यतीत की॥१०-११॥ प्रातःकाल उठकर मन्त्रियों की बात न मानकर राजा उदयन ने हाथी के लोभ में उन शिकारी गुप्तचरों को आगे करके जंगल में प्रस्थान किया। उसके ज्योतिषियों ने उसकी मृगया यात्रा का फल बताया था कि कन्या-लाभ तो होगा किन्तु बन्धन (कैद) के साथ। इस बात पर भी उसने ध्यान नहीं दिया॥१२-१३॥ विन्ध्यारण्य में पहुँचकर राजा उदयन ने सेनाओं को दूर ही रोक दिया कि उनकी भीषण ध्वनि से हाथी भड़ककर कहीं भाग न जाय केवल शिकारी गुप्तचरों को साथ लेकर राजा घोषवती वीणा को बजाता हुआ और अपने बचपन की बात स्मरण करता हुआ घोर जंगल में प्रवेश कर गया॥१४ १५॥ गुप्तचरों द्वारा दूर से दिखाये हुए तथा विन्ध्यवन की दाहिनी ओर घूमते हुए उस कल्पित हाथी को राजा ने देखा॥१६॥