भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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द्वितीय लम्बक २५ यौगन्धरायण द्वारा दूत के मुंह से पहले से ही सूचित वत्सराज का प्रधान सेनापति रुमण्वान् भी वहाँ आ पहुँचा ॥४४॥ उसके साथ ही चारों दिशाओं को व्याप्त करती हुई सेनाएँ भी आ पहुँचीं ॥४५॥ उस विन्ध्यभूमि में स्थित अपनी सेना के शिविर में प्रवेश करके उज्जयिनी का समाचार प्राप्त करने के लिए उसने स्थिर रूप से निवास किया। जब उदयन उसी शिविर में निवास कर रहा था उसी समय यौगन्धरायण का मित्र एक बनिया उज्जयिनी से वहाँ आया और कहने लगा—'महाराज ! उज्जयिनी-नरेश चण्डमहासेन आप जामाता पर बहुत प्रसन्न हैं। उसने आपके पास अपने सन्देशवाहक प्रतिहार (खवास) को भेजा है ॥४६ ४८॥ वह आकर यहाँ ठहरा है। पहले मैं यहाँ आया हूँ। वह गुप्त रूप से आपसे निवेदन करना चाहता है। इसका आगमन जानकर वत्सराज प्रसन्न हुआ और राजा की उसने प्रशंसा की। वासवदत्ता भी उससे प्रसन्न थी। यह समाचार सुनते समय अपने बन्धुओं को छोड़कर आई हुई और विवाह के लिए शीघ्रता करती हुई वासवदत्ता लज्जित और उत्सुक हुई। उसने निकट बैठे हुए वसन्तक से कहा कि तुम एक कहानी सुनाओ ॥४९—५२॥ वसन्तक ने भी उस सुलोचना वासवदत्ता को पतिभक्ति बढानेवाली कहानी सुनाना प्रारम्भ किया ॥५३॥ गुहसेन और देवस्मिता की कथा इस देश में ताम्रलिप्ति नाम से प्रसिद्ध एक नगरी है। उसमें बहुत बड़ा धनी धनदत्त नाम का एक वैश्य रहता था ॥५४॥ वह पुत्रहीन था अतः उसने बहुत-से ब्राह्मणों को बुलाकर उन्हें प्रणाम करके निवेदन किया कि आप लोग ऐसा उपाय करें जिससे मुझे पुत्र लाभ हो ॥५५॥ यह सुनकर ब्राह्मणों ने कहा 'यह कोई कठिन काम नहीं है। ब्राह्मण लोग वैदिक कर्मों से सभी दुष्कर कार्यों को सुकर बना सकते हैं ॥५६॥ प्राचीन समय में एक पुत्रहीन राजा था उसकी एक ही पाँच रानियाँ थी। पुत्रेष्टि यज्ञ करने के पश्चात् राजा के घर जन्तु नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ जो सभी मौसा की आँखों के लिए दूज के चाँद के समान था ॥५७-५८॥