भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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द्वितीय लम्बक २७ किसी समय घुटनों के बल रेंगते हुए उस बालक की जांघ में एक चींटी ने काट लिया। फलतः बच्चा चिल्लाकर व्याकुल हो गया ॥५९॥ इतने में ही रनिवास में कोलाहल मच गया। राजा भी 'पुत्र-पुत्र' कहते हुए साधारण व्यक्तियों के समान रोने लगा ॥६०॥ कुछ समय के उपरान्त चींटी को हटा देने और बालक को चुप करा देने पर राजा एक- पुत्रता की निन्दा करने लगा। एक पुत्र का होना दुःख का कारण होता है। क्या कोई ऐसा भी उपाय है कि मेरे बहुत-से पुत्र उत्पन्न हो जायें सन्ताप के कारण राजा ने पुनः ब्राह्मणों को बुलाकर इस प्रकार पूछा ॥६१॥ ब्राह्मणों ने उससे कहा—'हाँ एक उपाय है। वह यह कि तुम्हारे इस लड़के को मारकर उसके मांस से हवन किया जाय। उस हवन-धूम की गन्ध को पाकर तुम्हारी सभी रानियाँ गर्भवती हो जायेंगी और तुम्हें अपनी रानियों की संख्या के बराबर पुत्र उत्पन्न होंगे। ब्राह्मणों की यह बात सुनकर राजा ने उनके कथनानुसार कार्य करना स्वीकार किया और तदनुरूप सारी व्यवस्था की। ब्राह्मणों ने पुत्र-कामना के लिए दक्षिणा का निश्चय करके यज्ञ किया और उससे गुहसेन नामक बालक उत्पन्न हुआ ॥६२-६६॥ बड़े होने पर उसके पिता ने उसके विवाह के लिए स्त्री ढूँढ़ना प्रारम्भ किया ॥६७॥ इसी प्रसंग में व्यापार के बहाने धनदत्त उसे लेकर पुत्रवधू लाने के लिए दूसरे द्वीप में भेजा गया ॥६८॥ दूसरे द्वीप में जाकर उसने धर्मगुप्त नामक बनिये से उसकी देवस्मिता नाम की कन्या को अपने पुत्र गुहसेन के लिए माँगा ॥६९॥ कन्या के अत्यन्त प्रिय होने के कारण और ताम्रलिप्ति को बहुत दूर समझकर धर्मगुप्त ने अपनी कन्या उसे नहीं दी ॥७०॥ किन्तु उसकी कन्या देवस्मिता गुहसेन को देखकर उसके गुणों से आकृष्ट होकर और अपने परिवारवालों को त्याग कर उसके साथ आने के लिए तैयार हो गई ॥७१॥ किसी सहेली के द्वारा गुहसेन से गुप्त निश्चय करके देवस्मिता गुहसेन और उसके पिता के साथ रात के समय ताम्रलिप्ति चली आई ॥७२॥ ताम्रलिप्ति पहुँचकर उन दोनों का विवाह-सम्बन्ध हो जाने पर उन दोनों का मन परस्पर प्रेमपाश में दृढ़तापूर्वक बँध गया ॥७३॥