भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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द्वितीय लम्बक १०१ कुछ समय के अनन्तर पिता की मृत्यु हो जाने पर गुहसेन को साथियों ने कटाह-द्वीप जाने की प्रेरणा दी॥७४॥ किन्तु उसकी पत्नी देवस्मिता ने अन्य स्त्रियों के समागम के भय से उसे जाने की अनुमति नहीं दी॥७५॥ एक ओर पत्नी के रोकने से और दूसरी ओर बन्धुओं की प्रेरणा से गुहसेन अपने कर्त्तव्य के प्रति विमूढ़ हो गया कि वह क्या करे, जाय या न जाय॥७६॥ तब गुहसेन ने देवमन्दिर में जाकर निराहार व्रत करना प्रारम्भ किया कि देवता मुझे जो उपाय बतायेंगे वही करूँगा ॥७७॥ उसके व्रत को देखकर देवस्मिता ने भी उसके साथ ही व्रत करना प्रारम्भ किया। व्रत से सन्तुष्ट होकर शिवजी ने दम्पति को स्वप्न में दर्शन दिया॥७८॥ और दोनों को दो कमल के पुष्प दे कर कहा कि 'एक-एक पुष्प तुम लोग अपने-अपने हाथ में रखो। दूर रहकर भी तुम दोनों में से यदि एक कोई भी सदाचार का त्याग करेगा तो दूसरे के हाथ का कमल मुरझा जायगा अन्यथा दोनों ही विकसित रहेंगे ॥७९-८०॥ सोकर उठने पर वैश्य-दम्पती ने अपने-अपने हाथों में एक-एक लाल कमल देखा। वे कमल मानों दोनों के हृदय प्रत्यक्ष रूप से दोनों के हाथों में थे॥८१॥ इस घटना के उपरान्त हाथ में कमल लिये हुए उस गुहसेन ने व्यापार के लिए कटाह द्वीप की ओर प्रस्थान किया किन्तु देवस्मिता घर पर ही कमल पर आँखें गड़ाई हुई रहने लगी ॥८२॥ कटाह द्वीप में पहुँचने पर गुहसेन ने रत्नों की खरीद-बेच प्रारम्भ की॥८३॥ उसके हाथ में सदा खिले हुए कमल को देखकर चार वैश्यपुत्रों को बहुत आश्चर्य हुआ ॥८४॥ वे किसी उपाय से उसे अपने घर ले गये और उसे मद्य-पान पिलाकर पद्म के सम्बन्ध में उससे पूछा। उस मदोन्मत्त गुहसेन ने भी सारा वृत्तान्त उन्हें कह सुनाया उन चारों ने गुहसेन की पत्नी का चरित्र नष्ट करने की कल्पना से गुप्त रूप से ताम्रलिप्ति की ओर प्रस्थान किया॥८५-८७॥ वहाँ पहुँचकर दुराचार के लिए उपाय सोचते हुए वे चारों दुष्ट किसी जैन-मन्दिर में गृहस्वामिनी योग-करण्डिका नाम की परिव्राजिका (तपस्वी) के पास गये ॥८८॥ २७