भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

पृष्ठ 340, कुल 876 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 340

तृतीय लम्बक २९९ कन्या-सम्बन्ध नामक सन्धि से मगधेश बाधित हो गया है अतः विरोध करके प्राणों से भी अधिक प्यारी पुत्री से कैसे हाथ धो लेगा॥१५६॥ उसे अपने सत्य का पालन करना चाहिए और तुम्हें भी। वास्तव में तुमने तो उसे ठगा नहीं। उसके लिए जो कुछ किया मैंने किया किन्तु यह भी उसके लिए दुःखकारक नहीं है॥१५७॥ इतने दिनों तक मैं गुप्तचरों से यह जानने का यत्न कर रहा था कि वह इस घटना के कारण विरुद्ध-क्रिया तो नहीं कर रहा है। इसीलिए हम इतने दिनों तक यहाँ ठहरे भी रहे॥१५८॥ इस प्रकार उत्तरदायित्व की रक्षा करनेवाले यौगन्धरायण के कहते ही मगधराज का दूत वहाँ आ पहुँचा॥१५९॥ पहरेदार के द्वारा सूचना प्राप्त होने पर उसी समय अन्दर बुलाये गये और प्रणाम करके बैठे हुए मगध दूत ने निवेदन किया॥१६०॥ रानी पद्मावती द्वारा भेजे गये जवाबी सन्देश से सन्तोष प्रकट करते हुए मगधेश ने महाराज को यह कहा है—अधिक कहने की आवश्यकता नहीं मैंने सब कुछ जान लिया है, तुम पर प्रसन्न हूँ जिस कार्य के लिए यह सब प्रयत्न किया गया है उसे प्रारम्भ करो। मैं तो तुम्हारे लिए सब हूँ अर्थात् अब तुम्हारा साथी हूँ॥१६१-१६२॥ उदयन ने मगधेश के इस स्पष्ट निर्देश का अभिनन्दन किया। यह सन्देश मानों यौगन्धरायण के नीति-वृक्ष के उगे हुए पुष्प के समान था॥१६३॥ तब यौगन्धरायण ने उदयन के द्वारा पद्मावती को वहीं बुलाकर उसके साथ ही दूत को उपहार, पुरस्कार आदि के द्वारा सन्तुष्ट करके विदा किया॥१६४॥ इसके अनन्तर ही उज्जयिनी से चण्डमहासेन का भी दूत आ गया, नियमानुसार राजा के सामने पेश होकर और प्रणाम करके बोला-महाराज! तुम्हारी वास्तविक स्थिति को जानते हुए राजा चण्डमहासेन ने प्रसन्नता के साथ सन्देश दिया है कि तुम्हारा महत्व इसी से विदित होता है कि तुम्हारा मन्त्री यौगन्धरायण है। इससे अधिक और क्या कहा जाय। देवी वासवदत्ता भी धन्य है, जिसके कारण सज्जन-समाज में हमारा सिर ऊँचा हुआ है। मेरे लिए पद्मावती वासवदत्ता से दूसरी नहीं है। उन दोनों का हृदय एक ही है इसलिए शीघ्र अपने उद्योग का प्रारम्भ करो॥१६५-१६९॥

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · पृष्ठ 340, कुल 876 में से · BharatKosha