कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
पृष्ठ 346, कुल 876 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय लम्बक ५५ पद्मावती को देखकर एक सहेली दूसरी से बोली कि सहेली के समान अपनी सौत से लज्जित नहीं हुई ॥२१॥ सचमुच शिव और कृष्ण ने इन दोनों (वासवदत्ता और पद्मावती) का रूप नहीं देखा। यदि वे देख लेते तो पार्वती और लक्ष्मी को कदापि प्यार न करते ॥२२॥ सुगन्धित और नवविकसित नीलकमल के समान लोचनवाली नगर रमणियाँ दोनों रानियों को देखकर इसी प्रकार की चर्चा करती रहीं ॥२३॥ इस प्रकार जनता की आँखों को राजा रानियों के साथ मंगलयुक्त आनन्द देता हुआ उदयन मंगलाचरण करके अपने राज-मन्दिर में गया ॥२४॥ राजा के भवन में प्रवेश करने पर उस भवन की शोभा ऐसी हुई जैसे प्रभात के समय कमल- सरोवर की और चन्द्रोदय होने पर समुद्र की होती है ॥२५॥ क्षण-भर में ही राजभवन सामन्त-नरेशों के मांगलिक उपहारों से ऐसा भर गया मानों पृथ्वी के समस्त राजाओं ने उपहार भेजे हों ॥२५॥ राजा उदयन ने सभी समागत सामन्त-नरेशों का सम्मान करके जनता के चित्त के समान उस राज-भवन में प्रवेश किया ॥२६॥ अपने भवन में रति और प्रीति के मध्य कामदेव के समान बैठे हुए, राजा उदयन ने पान-गोष्ठी (मद्यपान) में उस बचे हुए दिन को व्यतीत किया ॥२७॥ ग्वालों की कथा दूसरे दिन राज-सभा में मन्त्रियों के साथ बैठे हुए राजा के सभी द्वार पर एक ब्राह्मण चिल्लाने लगा। महाराज ! महान् अनर्थ है कि जंगल में ग्वालों ने बिना कारण ही मेरे पुत्र के पैर काट डाले ॥२८-२९॥ यह सुनकर राजा ने दो-तीन ग्वालों को पकड़वा कर बुलाया और पूछने पर वे बोले—महा- राज! हमलोग गौएँ चराते और निर्जन वन में खेलते हैं हमलोगों के बीच देवसेन नामक एक ग्वाला है। वह जंगल के एक स्थान पर पत्थर की चट्टान पर बैठकर कहता है कि मैं तुम्हारा राजा हूँ और हमारा शासन भी करता है। हमलोगों में कोई भी उसकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करता। इस प्रकार वह गोपालक जंगल में राज्य करता है। आज इस ब्राह्मण के लड़के ने उस रास्ते से जाते हुए उस ग्वाले राजा को प्रणाम नहीं किया। हमलोगों ने उससे कहा भी कि तुम बिना प्रणाम किये न जाओ फिर भी हँसते हुए उस बालक ने हमलोगों की बात न मानी ॥३०-३५॥ १९