भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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प्रथम लम्बक ५ शिव और पार्वती का संवाद किन्नर, गन्धर्व और विद्याधरों की निवासभूमि तथा समस्त कुलपर्वतों का सम्राट् हिमालय पर्वत प्रसिद्ध है॥१३॥ पर्वतों में इस हिमालय का माहात्म्य इतना बड़ा-चढ़ा है कि साक्षात् त्रिजगज्जननी पार्वती उसकी पुत्री बनीं ॥१४॥ इस हिमालय का उत्तर शिखर कैलास नाम से प्रसिद्ध है, जो सहस्रों योजन के भू-भाग को आक्रान्त करके फैला है॥१५॥ यह कैलास-शिखर, अपनी धवल-धवल कान्ति से मन्दराचल को हँसता है कि उसके द्वारा क्षीर-समुद्र का मन्थन होने पर भी वह मेरे समान सुधा-धवल न हो सका और मैं बिना प्रयत्न के ही शुभ्र हूँ ॥१६॥ उस कैलास शिखर पर, स्थावर-जंगम सृष्टि के स्वामी विद्याधरों और सिद्धों से सेवित महेश्वर नित्य पार्वती के साथ निवास करते हैं॥१७॥ जिस शिवजी के पीतवर्ण एवं ऊँचे जटामूट पर स्थित अभिनव चन्द्रमा उदयाचल के सन्ध्याकालीन पीतवर्ण की शोभा धारण करता है॥१८॥ जिस शिवजी ने अन्धकासुर के हृदय में शूल भौंकते हुए एक साथ ही तीनों लोकों के हृदय से शूल को सदा के लिए निकाल दिया ॥१९॥ जिस शिव के चरणों में प्रणाम करने के कारण मुकुटमणियाें में नख के अग्रभाग के प्रतिबिम्बित होने के कारण सुर और असुर-राज ऐसे मालूम होते हैं कि उन्हें प्रसाद-रूप में अर्धचन्द्र प्राप्त हुआ हो॥२० ॥ किसी समय लोकनाथ स्वामी को एकान्त में बैठे देखकर उनकी प्राणवल्लभा पार्वती ने उन्हें स्तुतियों से प्रसन्न किया॥२१॥ पार्वती के स्तुति-वचनों से प्रसन्न होकर, अतः उन्हें गोद में बैठाकर चन्द्रशेखर शिवजी ने पूछा 'कहो मैं तुम्हारे लिए कौन-सा प्रिय कार्य करूँ' ॥२२॥ तब पार्वती ने कहा—'स्वामिन् हे देव यदि तुम मुझ पर प्रसन्न हो तो कोई नवीन कथा सुनाओ' ॥२३॥ यह सुनकर शिवजी ने कहा—'प्रिये संसार में भूत वर्तमान और भविष्य की कौन-सी ऐसी बात है जिसे तुम न जानती हो' ॥२४॥ इतना कहने पर भी शिववल्लभा पार्वती ने स्वामी से पुनः कथा सुनाने का आग्रह किया क्योंकि मानिनी स्त्रियों का मन सदा ही प्रियपति के प्रणय की अभिलाषा रखता है॥२५॥ शिवजी ने पार्वती का आग्रह देखकर उसे प्रसन्न करने की दृष्टि से उसी (पार्वती) के सम्बन्ध की स्वस्य कथा का वर्णन किया॥२६॥ एक बार ब्रह्मा और नारायण मेरे दर्शन के लिए निकले और सारी पृथ्वी पर भ्रमण हुए हिमालय की उपत्यका में आये॥२७॥