भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

पृष्ठ 458, कुल 876 में से

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चतुर्थ लम्बक ४१९ माता के इस प्रकार कहने पर राजकुमार बोला कि 'बिना राजा के योग्य साज-सामान के वहाँ जाने पर कौन मेरा सम्मान करेगा। यह सुनकर माता ने बेटे से फिर कहा कि 'तुम श्वशुर के घर जाकर उससे धन लेकर अपना साज-सामान आदि ठीक करके चक्रवर्ती के पास जाओ ॥६६-६८॥ इस प्रकार माता से प्रेरित वह राजकुमार श्वशुर से धन माँगने में लज्जित होता हुआ भी गया और सायंकाल मथुराम् मे पहुँचा ॥६९॥ पितृहीन भ्रष्टराज्य और धनवासा वह राजकुमार रोने की शंका से उस समय घर में जाना उचित न समझकर श्वशुर-गृह के समीप ही एक धर्मशाला में ठहर गया ॥७० ॥ धर्मशाला में रहते हुए उसने रात को रस्सी के सहारे ऊपर चढ़ती हुई एक स्त्री को देखा ॥७१॥ कुछ समय में ही रत्नों की चमक से चमकती हुई अपनी स्त्री को उसने पहचान लिया और आकाश से गिरी हुई उल्का के समान उसे देखकर सन्तप्त हो गया ॥७२॥ उसकी स्त्री मार्ग रमण से दुर्बल और धूल से धूसरित उसके शरीर को देखकर भी उसे न पहचान सकी और पूछने लगी कि 'तुम कौन हो ?' उत्तर में उसने कहा—'मैं पथिक (बटोही) हूँ ॥७३॥ तब वह स्त्री धर्मशाला के अन्दर गई। राजकुमार भी रहस्य जानने की इच्छा से छिपकर उसका पीछा करने लगा ॥७४॥ वहाँ पर एक पुरुष भी आया और उसने 'तू देर से आई' ऐसा कहकर उस स्त्री को लातें मारी ॥७५॥ लात खाकर वह पापिष्ठ दूयूने प्रेम से उसे मनाकर उसके साथ विहार करने लगी ॥७६॥ उसे देखकर वह बुद्धिमान् राजकुमार सोचने लगा कि 'यह चाप करने का समय नहीं है। मुझे तो इस समय दूसरा ही कार्य सिद्ध करना है ॥७७॥ शत्रुओं के पाश अपने शस्त्र का इस पातिन स्त्री और महान् पर क्या चलाऊँ? जैसी दुष्ट स्त्री से भी क्या प्रयोजन ? यह मेरे दुर्भाग्य का ही दोष है या मेरे धैर्य की परीक्षा का स्वभाव देखने के लिए विधाता दुःखों की वर्षा कर रहा है ॥७८-३ ॥ असंसान कुला के सम्बन्ध का यह परिणाम है। इसमें उस स्त्री का क्या दोष है। कोई कौवे को छोड़कर पारवत (नर) का धैर्य १ बात गवती है ॥८४ ॥

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