भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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चतुर्थ लम्बक ४६१ तदनन्तर परस्पर वार्तालाप के प्रसंग में सिसकते हुए उसे विद्याधरों का राजा जानकर और भ्रम से उसे खाकर गरुड़ को भारी मानसिक ताप हुआ ॥२३८॥ वह सोचने लगा कि मुझ जैसा क्रूर ने भारी पाप किया। उच्छृङ्खल वृत्ति के व्यक्तियों से पाप हो जाना सुलभ या स्वाभाविक है। यह एक प्रशंसनीय महात्मा है जो दूसरों के लिए अपने प्राण दे रहा है। मैंने अज्ञानवश संसार को नीचा कर दिया ॥२३९ २४ ॥ इस प्रकार पश्चात्ताप कर पापमुक्ति के लिए आग में जलकर प्राण-त्याग करने की बात सोचते हुए गरुड़ को जीमूतवाहन ने कहा—॥२४०॥ 'हे पक्षीराज ! दुःखी क्यों हो रहे हो। यदि सचमुच पाप से डरते हो तो आज से इन सर्पों का भक्षण करना छोड़ दो। पहले जिन्हें खा चुके हो उनके लिए पश्चात्ताप करो। यही इसका प्रायश्चित्त या प्रतिक्रिया है। और कुछ सोचना व्यर्थ है' ॥२४२-२४३॥ इस प्रकार प्राणियों पर दया करनेवाले जीमूतवाहन के कहने पर गरुड़ ने उसके वचन को गुरु की आज्ञा के समान माना ॥ २४४॥ और, तदपश्चात् वह खाये हुए नागों को जीवित करने के लिए अमृत लेने गया। उस अमृत से क्षत-विक्षत अंगवाले जीमूतवाहन पर उसकी पत्नी मलयवती की भक्ति से सन्तुष्ट गौरी ने स्वयं आकर अमृत-सिंचन किया। स्वयं गौरी के अमृत-सिंचन से अधिक मनोहर होने के कारण उसकी शोभा और बढ़ गई। लावण्ययुक्त देवताओं के भाव-बोध के साथ स्वस्थ होकर उठे जीमूतवाहन को देखकर गरुड़ ने समूचे समुद्र-तट पर अमृत की वर्षा कर दी ॥२४५ २४८॥ इस अमृत-सिंचन से तट पर इधर-उधर बिखरे हुए सभी नाग-कंकाल पुनर्जीवित हो उठे। फलतः वह शंखा-वत्त नागों के झुंडों से भर गया और उन्हें सर्वदा के लिए गरुड़ के भय से मुक्ति मिल गई ॥२४९॥ ऐसा प्रतीत होता था कि नागकुल के रक्षक जीमूतवाहन को देखने के लिए मानो सारा पाताल वहीं आ गया हो ॥२५०॥ तदनन्तर अक्षय शरीर और अक्षय यश से शोभित जीमूतवाहन का समस्त बन्धुओं ने अभिनन्दन किया ॥२५१॥ जीमूतवाहन की पत्नी और उसके माता-पिता सभी परम प्रसन्न हुए। सच है दुःख के सुख-रूप में परिणत हो जाने पर कौन प्रसन्न नहीं होता ॥ २५२॥