कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ लम्बक ४७१ उसकी कलहकारिणी नाम की पत्नी यथार्थ नामवाली थी जो शरीर और हृदय दोनों से कुटिल थी ।।३३।। वह धैर्यशाली सिंहविक्रम नौकरी से और जुए से भी प्राप्त सभी धन उस पत्नी को अर्पण कर देता था।।३४।। तीन पुरुषोंकी वह दुष्टा स्त्री एक क्षण भी बिना कलह किये नही रह सकती थी ।।३५।। वह अपने पति से कहा करती थी कि 'तुम बाहर ही खाते-पीते हो मुझे कुछ नहीं देते हो'। इस प्रकार वह उसे प्रतिदिन सन्ताप देती थी।।३६।। भोजन वस्त्र और आभूषण आदि से सदा उसको प्रसन्न रखने की चेष्टा करते रहने पर भी वह ज्वलन्त मोम-गुग्गुल के समान सदा जलती ही रहती थी।।३७।। इस प्रकार उसके दुःख से दुःखी सिंहविक्रम उस घर को छोड़कर विन्ध्यवासिनी देवी का दर्शन करने के लिए चला गया ।।३८।। वहां जाकर उसके निराहार धरना देने पर प्रसन्न देवी ने स्वप्न में उससे कहा—'बेटा ! उठो अभी वाराणसी नगरी को जाओ।।३९।। वहाँ एक बहुत विशाल वटवृक्ष है उसकी जड़ खोदने पर तुम बहुत बड़ा खजाना पाओगे। उसके भीतर तुम मानों आकाश से गिरा हुआ और तलवार-सा चमकता हुआ एक मणिमय पात्र पाओगे। उसके भीतर देखने से सभी प्राणियों के पूर्वजन्म तुम देख सकोगे। उससे तुम अपनी पत्नी तथा अपने पूर्व जन्म की जाति को जानकर सफल मुखी और शोकरहित हो जाओगे' ।।४०-४३।। देवी से इस प्रकार आदिष्ट वह सिंहविक्रम प्रातःकाल उठकर और व्रत का पारण (समाप्ति) करके वाराणसी को गया ।।४४।। वहाँ जाकर उसने वटवृक्ष की जड़ से खजाना प्राप्त किया और वह पात्र भी उसे मिल गया ।।४५।। उस पात्र में उसने अपनी पत्नी को पूर्वजन्म में भीषण भालू (भाड़ा) के रूप में और अपने को सिंह के रूप में देखा। अतः उसने पूर्वजन्म के जातिगत संस्कारों के कारण अपना और पत्नी का घोर मतभेद समझकर दुःख और मोह छोड़ दिया ।।४६-४७।।