कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपंचम लम्बक ५४५ तब हमारे स्वामी कपालस्फोट ने प्रसन्न होकर हमारा नगर मुझे दे दिया। उसमें मैं अपनी कन्या के साथ आनन्द से रहती हूँ॥१९८॥ इस समय मेरी कन्या नयी चढ़ी जवानी पर है। उसके लिए किसी उत्कृष्ट वीर वर की प्राप्ति की चिन्ता मुझे सता रही है। इसीलिए उस दिन चतुर्दशी की रात को राजा के साथ आते हुए तुम्हें देखकर मैं यहाँ रुक गई और सोचने लगी कि यह भव्य सुन्दर वीर और युवा मेरी कन्या के लिए योग्य पति है। अतः इसकी प्राप्ति के लिए कोई उपाय क्यों न करूँ ॥१९९-२ १०॥ ऐसा सोचकर शूली से बिंधे मनुष्य के बहाने झूठे ही त्रस फैलाकर मैं तुझे श्मशान के बीच लाई॥२ १॥ माया से दिखाये गये रूप आदि के झूठे प्रपंच से झूठ बोलकर मैंने कुछ समय के लिए तुझे धोखा दिया॥२ २॥ तुम्हारा फिर से आकर्षण करने के लिए जान-बूझ कर अपन एक पायजेब को छोड़कर मैं चली गई॥२ ४॥ आज इस रूप में तुम्हें पुनः प्राप्त किया है, तो अब तुम मेरे घर जाकर मेरी कन्या का उपभोग करो और दूसरा पायजेब भी ले जाओ' ॥२ ५॥ राक्षसी के इस प्रकार कहने पर वह वीर उसकी बात को स्वीकार करके उसी की सिद्धि के प्रभाव से आकाश-मार्ग द्वारा उसके नगर में गया ॥२ ६॥ उसने हिमाचल के शिखर पर सोने के चमकते हुए नगर का इस प्रकार देखा मानो आकाश- गमन की श्रान्ति को मिटाने के लिए अचल सूर्यबिम्ब स्थित हो गया हो॥२ ७॥ वहाँ पर उसने राक्षसराज की विद्युत्प्रभा नाम की कन्या को भी प्राप्त किया जो उसके साहस की साक्षात् सिद्धि के समान थी ॥२ ८॥ उसके साथ कुछ समय तक वहीं रहकर अशोकदत्त सास की सम्पत्ति का सुख प्राप्त करता रहा ॥२ ९॥ कुछ समय बीतने पर उसने सास से कहा—'मुझे वह पायजेब दो अब मैं वाराणसी नगर जाऊँगा। वहाँ मैंने राजा के सामने तुम्हारा एक पायजेब लाने की प्रतिज्ञा की है। दामाद के इस प्रकार कहने पर उसकी सास ने दूसरा पायजेब भी उसे दे दिया और साथ ही एक सोने का कमल भी उसे दिया॥२१०-२१२॥