भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

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पञ्चम लम्बक ५७१ राजकन्या पहले ही हँसे हुए उस ब्राह्मण-युवक को देखकर बोली—'पिताजी यह फिर भी कुछ इधर-उधर की मनमानी झूठ बोलेगा'॥१९१॥ तब शक्तिदेव ने राजकुमारी से कहा—'मैं सच हूँ या झूठ लेकिन राजकुमारी तू मरे एक कौतुक को दूर कर, मैं कहता हूँ मैंने कनकपुरी में तुझे पलंग पर मरी हुई पड़ी देखा है। यहाँ यह बात नहीं देख रहा हूँ तू कैसे जी रही है यह रहस्य मुझे बता ॥१९२॥ शक्तिदेव द्वारा सच्ची जानकारी व गाव इस प्रकार कहने पर वह राजकन्या कनकरेखा पिता के सामने बोली—॥१९३॥ पिताजी इसने सचमुच वह नगरी देखी है। अतः यह शीघ्र ही कनकपुरी में जाने पर मेरा पति होगा॥१९४॥ वहाँ पर मेरी और भी तीन बहिनों को ब्याहेगा और नगरी में विद्याधरों पर राज्य करेगा॥१९५॥ अब आज ही मुझे अपनी नगरी और अपने पूर्व कलेवर में प्रवेश करना चाहिए। मुनि के शाप से मैं तुम्हारे घर में उत्पन्न हुई थी॥१९६॥ शाप देने के पश्चात् मुनि ने शाप का अन्त इस प्रकार कहकर किया था कि जब कोई मनुष्य कनकपुरी में तेरा मृत शरीर देखकर मनुष्य-शरीर धारण करनेवाली तेरा रहस्य प्रकट करेगा तब तेरी शाप से मुक्ति होगी और वह मनुष्य तेरा पति होगा॥१९७॥ मानव-शरीर पाकर भी मैं पूर्वजन्म का स्मरण करती थी और मुझे सब ज्ञान था। सो अब मैं अपनी सिद्धि के लिए अपने विद्याधरस्थान को जाती हूँ॥१९८॥ इतना कहकर राजपुत्री अपना शरीर त्यागकर अन्तर्हित हो गई और राजभवन में जोर से रोना-चिल्लाना मच गया॥१९९॥ दोनों ओर से मारा गया शक्तिदेव उन उन रत्नों को प्राप्त करके भी इन दोनों (चन्द्र- प्रभा और कनकरेखा) प्रेयसियों में से एक को भी न पाकर स्तब्ध-सा रह गया॥१११॥ अनन्तर मनोरथभंग या निष्फता से अपनी निन्दा करता हुआ उसी समय राजभवन से निकलकर सोचने लगा—॥१११॥ कनकरेखा ने कहा है जब मेरी अभिलाषा पूर्ण होगी ही तब क्यों व्यर्थ दुःखी होऊँ, स्थितियाँ मनोरथ के अधीन होगीं? ॥११॥ तो मैं फिर उसी मार्ग से कनकपुरी को जाऊँ। भाग्य फिर भी अवश्य मेरी सहायता करेगा। ऐसा सोचकर वह शक्तिदेव वर्धमान नगर से चल पड़ा। कष्ट है उसकी ओर उस दिशा सम्बन्धी प्रयत्न किये प्रयत्न से दुःख नहीं॥११३॥११७॥