कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ लम्बक ६११ राजा के इस प्रकार कहने पर रानी ने प्रसंगतः कहा—'क्या यह सत्य है कि शुभ या अशुभ का भोग देनेवाला कर्म ही है' ॥७८॥ इस विषय की भूमिका के रूप में रानी ने राजा से कहा मैं इस प्रसंग की सुनी हुई एक कहानी तुम्हें सुनाती हूँ सुनो— राजा धर्मदत्त की कथा कोशल-देश का एक राजा था। उसका नाम धर्मदत्त था। उसकी नागश्री नाम की पति- व्रता रानी थी। सतियों के मान को रोके हुए भी (रूपवती) वह पृथ्वी पर बन्धुमती नाम से विख्यात हुई। कुछ समय के उपरान्त उस रानी के गर्भ से उस राजा की मैं पुत्री उत्पन्न हुई ॥७९-८१॥ एक बार जब मैं बहुत छोटी थी तब मेरी माता ने अकस्मात् अपने पूर्वजन्म की जाति का स्मरण करके अपने पति से कहा—॥८२॥ 'राजन् ! मैंने आज अकस्मात् ही पूर्वजन्म का स्मरण किया है। यदि मैं उसे आपसे न कहूँ तो प्रेम के विरुद्ध है और यदि कहूँ तो मेरी मृत्यु होती है ॥८३॥ कहते हैं कि यदि पूर्वजन्म की स्मृति बिना किसी शंका के हो जाय तो उसका कहना मृत्यु के लिए होता है। इसलिए मुझे बहुत खेद है' ॥८४॥ पत्नी द्वारा इस प्रकार कहे गये हुए राजा ने उससे कहा—'प्रिये ! मैंने भी तुम्हारे ही समान सहसा अपना पूर्वजन्म स्मरण कर लिया है। इसलिए तू मुझसे कह दे और मैं भी तुझसे कह देता हूँ। जो होना होगा होगा। भवितव्यता को कौन लौटा सकता है ॥८५-८६॥ इस प्रकार पति से प्रेरित होकर रानी ने कहा—'राजन् ! सुनो कहती हूँ—पूर्वजन्म में इसी (कोशल) देश में मैं माधव नामक किसी ब्राह्मण की सदाचारिणी दासी थी। देवदास नाम का मेरा पति था। वह सम्भवतः किसी वैश्य के घर में नौकर था ॥८७-८८॥ इस प्रकार हम दोनों, अपने अनुरूप घर बनाकर, अपने-अपने स्वामियों (मालिकों) के घरों से लाये हुए पक्वान्नों से जीवन-निर्वाह किया करते थे ॥८९ ॥ पानी का एक मटका (घड़ा) झाड़ू चारपाई, मैं और मेरा पति—ये तीन जोड़ियाँ हमारे घर में थीं ॥९१॥