भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

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षष्ठ लम्बक ६१७ कुछ दिनों में अनशन के कारण वे सातों शिष्य मर गये किन्तु सत्य-भाषण के प्रभाव से वे पूर्वजन्म का स्मरण करते थे॥१२० ॥ इसी प्रकार किसानों के समान पुण्यात्माओं का छोटा-सा बीज भी दृढ़ संकल्प के जल-से सींचा जाकर अच्छा फल देता है॥१२१॥ वही दुष्ट-भावना से दूषित होकर अनिष्ट फल देता है। इस प्रसंग में एक कथा सुनो॥१२२॥ एक ब्राह्मण और चाण्डाल की कथा प्राचीन समय माघ के महीने में एक ब्राह्मण और एक चांडाल एक साथ अनशन करके तपस्या कर रहे थे। एकबार भूखे ब्राह्मण ने गंगातट पर मछलियां पकड़कर लाते हुए धीवरों को देखकर सोचा कि ये हृष्ट धीवर संसार में धन्य हैं, जो प्रतिदिन ताजी-ताजी मछलियां निकालकर यथेष्ट भोजन करते हैं॥१२३-१२५॥ इधर चांडाल ने उन्हीं धीवरों को देखकर सोचा कि इन माँसाहारी प्राणिहिंसक धीवरों को धिक्कार है। इसलिए ऐसे दुष्टों का मुँह देखने से क्या लाभ? ऐसा सोचकर और आँखें बन्द करके वह आत्म-चिन्तन करने लगा॥१२६-१२७॥ अनशन के कारण क्रमशः वे दोनों ब्राह्मण और चांडाल गलकर मर गये। उनमें ब्राह्मण को तो कुत्ते खा गये और वह चांडाल गंगाजल में ही मर गया॥१२८॥ मरने पर, दुष्ट भावना के कारण वह अपकृष्ट ब्राह्मण धीवरों के कुल में ही उत्पन्न हुआ। किन्तु तप के प्रभाव से उसे पूर्वजन्म का स्मरण रहा॥१२९॥ धैर्यशाली महत्तत्त्वज्ञानी चांडाल राजा के घर में जन्म लेकर जातिस्मर रहा। अर्थात् उसे अपनी पूर्वजन्म की जाति का भी स्मरण रहा॥१३० ॥ इस प्रकार पूर्वजन्म को स्मरण करते हुए उन दोनों में एक दास (धीवर) होकर अत्यन्त दुखी और दूसरा राजा होकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ॥१३१॥ इस प्रकार कर्मवृक्ष का मूल—मन जिस प्रकार से सींचा जाता है उसको उसी प्रकार का फल मिलता है॥१३२॥ राजा कलिङ्गदत्त इस प्रकार रानी तारादत्ता को कथा सुनाकर इसी प्रसंग में और भी इस प्रकार कहने लगा—॥१३३॥ ७८

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