भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

पृष्ठ 672, कुल 876 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 672

षष्ठ लम्बक ६१९ देवि और भी बात है। जो काम जिस प्रकार के आत्मबल से युक्त होता है, उसका फल भी उसी के अनुसार होता है क्योंकि सम्पत्तियाँ सत्त्व (मनोबल) का अनुसरण करती हैं॥१३४॥ इस सम्बन्ध में तुमको एक अद्भुत कथा सुनाता हूँ। राजा विक्रमसिंह और दो ब्राह्मणों की कथा इस देश में संसार-प्रसिद्ध उज्जयिनी नाम की एक नगरी है॥१३५॥ वह नगरी महाकाल की निवासभूमि है। जिसमें मानों शिवजी की सेवा के लिए आये हुए कैलास-शिखरों के समान ऊँचे-ऊँचे श्वेत महल सुशोभित हैं॥१३६॥ समुद्र के समान गम्भीर उस नगरी का विस्तार चक्रवर्ती-रूपी जल से भरा रहता है। सेना-रूपी सैकड़ों नदियाँ उसमें सदा बहती रहती हैं। अपने पदवाले महीधरों (पर्वतों और राजाओं) का वह आश्रय-स्थान है। उसी नगरी में विक्रमसिंह नाम का यथार्थ नामवाला राजा राज्य करता था। उसके सम्मुख कहीं भी शत्रु-रूपी मृग नहीं थे॥१३७-१३८॥ शत्रुओं के अभाव के कारण उस कर्मोद्यत उत्सव का अवसर नहीं मिला था। इसलिए शस्त्र और बाहुयुद्ध में उसकी आस्था न थी। इस कारण वह मन-ही-मन दुःखी रहता था॥१३९॥ एकबार वार्तालाप के प्रसंग में राजा के मनोभाव जानने के विचार से उसके मन्त्री अमरगुप्त ने उससे कहा॥१४०॥ महाराज ! अपनी भुजाओं के बल के घमंड से और शस्त्र-विद्या की जानकारी के मद में शत्रुओं की प्रार्थना करनेवाले राजाओं को दोष दुर्दम नहीं कहा जा सकता अर्थात् विपत्ति आ सकती है। जिस प्रकार बाणासुर ने अपनी हजार भुजाओं के घमंड में शिवजी की आराधना करके उनसे युद्ध करने योग्य शत्रु का वर माँगा था॥१४१-१४२॥ क्रमशः उसी प्रकार का वर न पाकर उसने शत्रु के रूप में विष्णु को प्राप्त किया और विष्णु ने युद्ध में उसकी सभी भुजाओं को काट डाला॥१४३॥ इसलिए तुम्हें भी युद्ध के बिना असन्तोष नहीं करना चाहिए। अनिष्टकारी प्रबल शत्रु की आकांक्षा भी न करनी चाहिए॥१४४॥ यदि तुम्हें युद्ध-विद्या और शस्त्र-चातुरी दिखानी हो तो उसके योग्य मृग-वन में शिकार पर दिखाओ॥१४५॥ इसीलिए व्यायाम शरवेध (निशानेबाजी) और शस्त्रों के अभ्यास आदि के लिए ही राजाओं के लिए शिकार का विधान किया गया है। बिना अभ्यास के राजा लोग युद्ध में समर्थ नहीं होते॥१४६॥ जंगली हिंस्र जन्तु पृथ्वी को प्राणियों से शून्य कर देना चाहते हैं। इसलिए वे राजाओं द्वारा मारे जाने योग्य हैं। इसलिए भी शिकार करना आवश्यक होता है॥१४७॥