भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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षष्ठ लम्बक ६११ 'संसार में धन देना ही सबसे महान् तप है। अर्थ देनेवाला प्राणदाता कहा जाता है क्योंकि प्राण धन में कीलित हैं॥९॥ करुणा से व्याकुलचित्त बुद्ध ने अपनी आत्मा को भी तृण के समान दे डाला। तब अकिंचन जन की क्या कथा ॥१०॥ ऐसे धैर्ययुक्त तप से निरीह बुद्ध ने दिव्य ज्ञान प्राप्त कर बुद्धत्व लाभ किया ॥११॥ इसलिए सभी प्रिय पदार्थों से आशा को हटाकर बुद्धिमान् व्यक्ति को भलीभाँति ज्ञान की प्राप्ति के लिए आजीवन प्राणियों का हित करना चाहिए' ॥१२॥ सात राजकुमारियों की कथा पूर्व समय में कृक नाम के किसी राजा की क्रम से अति सुन्दरी सात कन्याएँ उत्पन्न हुईं॥१३॥ बाल्यकाल में ही वे कन्याएँ वैराग्य से पिता का घर छोड़कर श्मशान का सेवन करने लगीं और अपने कुटुम्बियों से कहने लगीं—॥१४॥ 'यह सारा विश्व असार है। उसमें भी यह तुच्छ शरीर सर्वथा असार है उसमें भी अपनी प्रिय वस्तुओं या प्राणियों का मिलना स्वप्न सा-सा भ्रम है॥१५॥ ऐसे असार संसार में दूसरों का हित करना ही एक मात्र सार है। इसलिए हमलोग इस शरीर से भी परहित कर रही हैं॥१६॥ इस जीते हुए सुन्दर शरीर को हम श्मशान में फेंक देती हैं जिससे यह मांस खानेवाले पशु-पक्षियों के उपयोग में आ सके। अन्यथा इस सुन्दर शरीर का क्या उपयोग है?' ॥१७॥ एक विरक्त राजकुमार की कथा और भी सुनो। पूर्वकाल में एक राजपुत्र था। वह सुन्दर युवा होने पर भी परिव्राजक बन गया ॥१८॥ वह भिक्षु किसी वैश्य के घर कभी भिक्षा लेने के लिए गया। कन्दर्प के समान बड़े-बड़े नेत्रवान् उस भिक्षुक को उस वैश्य की युवती स्त्री ने देखा और वह उसके आँखों के लावण्य पर आसक्त होकर बोली—'राम सुन्दर तुमने यह कष्टकर व्रत क्यों धारण किया॥१९-२०॥ वह स्त्री धन्य है जो तुम्हारे इन नयनों से देखी जाती है। उसके इस प्रकार कहने पर भिक्षु ने अपनी आँख फोड़ ली। ॥२१॥ १ ऐसी ही दन्तकथा महाकवय कवि सूरदास के सम्बन्ध में प्रचलित है। आयर- लैण्ड के आरक्षी बीजीड के सम्बन्ध में भी ऐसी दन्तकथा प्रचलित है।—अनु.