कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ लम्बक ६४३ इसी प्रकार वे दिव्य रमणियाँ तुम्हारे समान पुरुषों के घरों में अवतार लेती हैं ॥ ९४ ॥ 'हे देव सुषेण इसी प्रकार कन्या के कारण ही सफल हुआ। आपके समान उच्च महा पुरुषों के यहाँ ऐसी ही कन्याएँ उत्पन्न होती हैं। अतः यह कन्या भी कोई दिव्य स्त्री है जो शापच्युत होकर तुम्हारे घर में उत्पन्न हुई है। इसलिए हे स्वामी ! चिन्ता न करो' ॥ ९५ ॥ इस प्रकार घर के वृद्ध ब्राह्मण द्वारा कही गई कथा को सुनकर राजा कलिङ्गदत्त चिन्ता छोड़कर प्रसन्न हुआ ॥ ९६॥ उस राजा ने चन्द्रकला के समान आँखों को आनन्द देनेवाली उस कन्या का नाम कलिङ्गसेना रखा ॥ ९७ ॥ वह राजकुमारी कलिङ्गसेना अपनी सखियों के साथ क्रमशः बड़ी होने लगी ॥ ९८ ॥ क्रीड़ा करते बालसमुदाय की लहरी के समान वह कन्या पिता के गृह में भवन में घरों में और उद्यानों में बिहार करती थी ॥ ९९ ॥ कलिङ्गसेना के पास सोमप्रभा का आगमन एक बार वह कलिङ्गसेना राजभवन की छत पर खेल रही थी। उसी समय आकाश- पथ से जाती हुई मायासुर की बेटी सोमप्रभा ने उसे उड़ते-उड़ते देखा और दूर से देखते ही उससे उसका प्रेम हो गया ॥ १ १ ॥ सोमप्रभा उसे देखकर सोचने लगी 'क्या यह चन्द्रकला है ? किन्तु दिन में उसकी इतनी कान्ति कहाँ ! यदि यह रति है, तो काम कहाँ है ? अतः यह अवश्य ही अभी कुमारी है ऐसा समझती हूँ ॥ १ २॥ सम्भव है कि कोई दिव्य स्त्री शाप से पतित होकर राजघराने में उत्पन्न हुई हो। मैं समझती हूँ कि पूर्वजन्म में इसकी और मेरी मित्रता रही है ॥ १ ३॥ क्योंकि अत्यन्त स्नेह से व्याकुल मेरा मन बरबस इसकी ओर खिंच रहा है। तो अब यह उचित है कि मैं इससे स्वयं मिलकर सखी के रूप में इसका वरण करूँ ॥ १ ४॥ सोमप्रभा यह सोचकर कि बालिका भयभीत न हो अप्रत्यक्ष रूप से नीचे उतर आई ॥ १ ५॥ उसके विश्वास के लिए वह मनुष्य-कन्या का रूप बनाकर धीरे-धीरे कलिङ्गसेना के पास पहुँची ॥ १ ६॥ 'दैवयोग से यह कोई अद्भुत रूपवाली राजकुमारी मेरे पास आ रही है यह मेरी सखी होने के योग्य है'—ऐसा सोचकर उसे देखते ही वह कलिङ्गसेना भी उठकर उससे लिपट गई ॥ १ ७-१ ८॥