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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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षष्ठ लम्बक १५१ उन वैतालों के साथ क्या मित्रता जो हँसते-हँसते प्राण ले लेते हैं। इसलिए हे राजपुत्री मेरी मित्रता में ऐसा विघ्न न करना ।। १५३।। भवन की छत पर सोमप्रभा से इस प्रकार की कथा सुनकर कलिङ्गसेना स्नेह के साथ सखी से कहने लगी ।। १५४।। सखि ये राजपुत्र पिशाच हैं राजपुत्र नहीं। इनको वश में रखना कठिन कार्य है। पिशाच को कठिनता से वश में रखने की एक कथा मैं तुम्हे सुनाती हूँ सुनो ।। १५५।। पिशाच और ब्राह्मण की कथा पूर्वकाल में मङ्गलस्थल नामक ग्राम में एक ब्राह्मण रहता था। वह कभी दुर्दशाग्रस्त होकर लकड़ियाँ लेने जंगल में गया ।। १५६।। वहाँ पर दैववश कुल्हाड़े से फाड़ी जाती हुई लकड़ी का एक टुकड़ा उसकी जाँघ के भीतर घुस गया। रक्त निकल जाने के कारण बेहोश पड़े हुए उसे किसी परिचित व्यक्ति ने उठाकर घर पर लाकर रख दिया ।। १५७-१५८ ।। घर पर घबराई हुई उसकी पत्नी ने उसका रक्त धोकर उसकी जाँघ पर पट्टी बाँध दी। उसकी निरन्तर चिकित्सा करने पर भी वह घाव दिनों दिन बढ़ता ही गया और वह नाड़ी-व्रण (नासूर) बन गया ।। १५९-१६० ।। नाड़ीव्रण हो जाने के कारण खिन्न वह दरिद्र ब्राह्मण मरण को तैयार हो गया। तब उसके किसी मित्र ब्राह्मण ने आकर एकान्त में उससे कहा—'यज्ञदत्त नामक मेरा मित्र अत्यन्त निर्धन होकर भी पिशाच की साधना से धन प्राप्त करके सुखी हो गया। इस साधना को उसने मुझे भी बताया है। अतः तुम भी पिशाच की साधना करो वह तुम्हारे इस व्रण को भर देगा ।। १६१-१६३।। ऐसा कहकर उसने उसे मन्त्र बता दिया और उसकी साधना-क्रिया भी इस प्रकार बताई— 'रात के पिछले पहर में उठकर केशों को खोलकर नंगे होकर, बिना स्नान किये ही दो मुट्ठी चावल दोनों हाथों में लेकर मन्त्र का जप करते हुए चौराहा पर जाना। वहाँ पर दो मुट्ठी चावल रखकर मौन होकर लौट आना और लौटते हुए पीछे नहीं देखना ।। १६४-१६६।।