भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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षष्ठ लम्बक १६५ तब सोमप्रभा ने कहा—'सखि इन फलों के खाने से कमलिनी को नष्ट करनेवाली हिमवर्षा के समान तुम्हारे सुन्दर रूप को नष्ट करनेवाली वृद्धावस्था कभी नहीं आयेगी ॥५५॥ इसीलिए मैं तुम्हें यहाँ लाई हूँ। तब तुरन्त अमृतवर्षा से सींची हुई-सी कलिङ्गसेना ने उन फलों को खाया ॥५६॥ वहाँ कौतुक से घूमते हुए उसने उस नगर के उद्यान को देखा जिसमें सोने के कमलों से बिछी हुई बावलियाँ थीं अमृत के समान स्वादिष्ट फलोंवाले वृक्ष थे हंस आदि विचित्र पक्षियों से वह उद्यान भरा था। वह उद्यान शून्य में मणियों के स्तम्भों का भ्रम उत्पन्न कर रहा था और शून्य में दीवारों की तथा तथा दीवारों में शून्यता का भ्रम उत्पन्न कर रहा था। पानी में स्थल की और स्थल में पानी की प्रतीति उत्पन्न कर रहा था। मय दानव की माया से निर्मित इस प्रकार का वह नगर एक अपूर्व नवीन संसार के समान था ॥५८-६० ॥ इस नगर में किसी समय सीता को ढूँढ़ते हुए वानर घुस आये थे किन्तु स्वयंप्रभा की कृपा से चिरकाल के पश्चात् उन्हें बाहर निकलने का अवसर मिला था ॥६१॥ इस नगर को भली-भाँति देखने से चकित और वृद्धावस्था से मुक्त कलिङ्गसेना को लेकर और स्वयंप्रभा से आज्ञा लेकर, सोमप्रभा यन्त्रनिर्मित वाययान द्वारा तक्षशिला को गई ॥६२-६३॥ वहाँ जाकर कलिङ्गसेना ने सब वृत्तान्त माता-पिता को सुनाया इससे वे दोनों और कलिङ्गसेना भी अत्यन्त सन्तुष्ट हुए ॥६४॥ इस प्रकार उन दोनों सखियों के मिलन करके अनेक दिनों के बीतने पर एक बार सोमप्रभा ने कलिङ्गसेना से कहा ॥६५॥ जबतक तू विवाहिता नहीं है तभी तक मेरी तेरी मित्रता है। फिर तेरे पतिगृह में चल जाने पर मेरी तेरी मित्रता कैसे रहेगी। मैं वहाँ कैसे आऊँगी ॥६६॥ सहेली के पति को न देखना चाहिए और न उस पर प्यार ही करना चाहिए। दूसरी बात यह है कि भेड़ के मांस को भेड़िये के समान सास बहू के मांस को खा जाती है। मैं इस सम्बन्ध में तुझे कलिङ्गसेना की एक कथा सुनाती हूँ ॥६७-६८॥ ८४