कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ लम्बक ६६१ अब इसके उदयन नाम का कारण भी सुनो—एक बार सहस्रानीक की रानी और उदयन की माता मृगावती गर्भवती हुई। गर्भावस्था में उसे रुधिर से भरी बावली में स्नान करने की इच्छा हुई, तो पाप से भीत राजा सहस्रानीक ने लाक्षा आदि के लाल रंग से बावली भरवा दी। उसमें स्नान की हुई रानी में मांस के टुकड़े का भ्रम करके गरुड़-वंश के पक्षी ने उसे उठा लिया और ले जाकर उदयाचल पर्वत पर उसे जीते ही छोड़ दिया॥४५-४७॥ वहाँ पर उसे पुत्र पति-मिलन की आशा दिलानेवाले जामदग्न्य ऋषि ने रानी को धैर्य प्रदान किया और उसे अपने आश्रम में ले गये॥४८॥ दिन पूरे होने पर रानी ने उसी आश्रम में पुत्र को इस प्रकार उत्पन्न किया जैसे आकाश नवीन चन्द्र को उत्पन्न करता है॥४९॥ अपमान से क्रुद्ध तिलोत्तमा ने उसके पति को शाप दिया था जो इस रूप में दोनों का वियोग दुःख देनेवाला हुआ॥५०॥ 'यह उदयन सारी पृथ्वी का चक्रवर्ती राजा हुआ और इसका पुत्र समस्त विद्याधरों का चक्रवर्ती राजा होगा'॥५१॥ इस प्रकार की आकाशवाणी के कारण और उदयपर्वत पर जन्म लेने के कारण इसका नाम उदयन हुआ॥५२॥ मातलि (इन्द्र के सारथी) द्वारा परिचय कराया गया और शाप का अन्त होने की आशा बाँधे हुए राजा सहस्रानीक ने मृगावती के बिना चौदह वर्ष वियोग में व्यतीत किये॥५३॥ शाप का अन्त होने पर, दैववश उदयाचल से आये हुए एक भील से परिचय पाकर और आकाशवाणी से प्रेरित होकर सहस्रानीक उसी भील को पथ प्रदर्शक बनाकर उदयाचल पर गया॥५४-५५॥ वहाँ पर मूर्तिमती वाञ्छित सिद्धि के समान मृगावती पत्नी तथा मनोराज्य के समान पुत्र उदयन को पाकर और उन्हें लेकर राजा कौशाम्बी आया। और, कौशाम्बी आते ही उदयन के गुणों से सन्तुष्ट होकर उसे युवराज-पद पर प्रतिष्ठित कर दिया॥५६-५७॥ और यौगन्धरायण आदि अपने मन्त्रियों के पुत्रों को उनके मन्त्रिमण्डल में प्रतिष्ठित कर दिया। उदयन के राज्य-भार सँभाल लेने पर राजा महारानी के साथ सांसारिक सुखों का उपभोग करता रहा। वृद्धावस्था में समस्त राज्य-भार उदयन को देकर राजा महाप्रस्थान को चला गया॥५८-५९॥