भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

पृष्ठ 802, कुल 876 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 802

[Header] षष्ठ लम्बकः ७४५

उस नाई के इस प्रकार कहने पर वह कपट-तपस्विनी उसकी बात को स्वीकार करके चली गई और महारानी को सब ठीक-ठीक बता दिया ॥१७८॥

महारानी ने भी ऐसा ही किया और परिणाम-स्वरूप राजा ने भी वह सब कुछ आंखों से देखकर कनकवर्मा को डाइन समझकर त्याग दिया ॥१७९॥

इससे प्रसन्न होकर महारानी ने उस दुष्ट भिक्षुणी को जो गुप्त धन दिया उस धन का उपयोग उसने नाई से मिलकर किया ॥१८०॥

वह कनकवर्मा भी राजा के अभिशाप से सन्त्रस्त होकर राजमहल से निकल गई। और जिस मार्ग से आई थी उसी मार्ग से पहले बोई हुई सरसों के क्षुपों की पहचान के सहारे वह अपने पिता के आश्रम में चली गई ॥१८१ १८२॥

ऋषि मंकणक इस प्रकार आई हुई कन्या को देखकर उसकी दुश्चरित्रता पर सन्देह करता हुआ कुछ समय के लिए ध्यानावस्थित हो गया ॥१८३॥

तदनन्तर समाधि में योगबल द्वारा समस्त वृत्तान्त जानकर स्नेहपूर्वक कन्या को स्वयं लेकर आश्रम से राजमहल में आ गया। आकर उसने प्रणाम करते हुए राजा से कहा— 'राजन्, धौत के दोष से यह सारा कपट-नाटक रचा गया है ॥१८४ १८४॥

उसी समय उस नापित ने जो कुछ हुआ था सब स्वयं जाकर राजा को बता दिया। और फिर बोला—'हे स्वामी मैंने इस प्रकार कनकवर्मा को आपसे पृथक् करके उसकी रक्षा की और महारानी को सन्तुष्ट किया' ॥१८६ १८७॥

इस प्रकार, मुनिवर बातों की सत्यता से विश्वस्त राजा ने कनकवर्मा को स्वीकार कर लिया। और ऋषि को कुछ दूर तक पहुँचाकर उन्हें बिदा करने के पश्चात् नापित को 'यह मेरा भक्त है' यह सोचकर उसने (राजा ने) उसे पर्याप्त धन दिया। खेद है कि राजा भी धूर्तों के धोप-भाजन होते हैं ॥१८८ १८९॥

तब से राजा दृढ़वर्मा अपनी महारानी से विमुख हो उस कनकवर्मा के साथ ही निश्चित होकर रहने लगा ॥१९ ॥

हे सुन्दर अंगोंवाली कलिङ्गसेने धौतें इस प्रकार के अनेक उपद्रव और दोष उत्पन्न कर देती हैं। तू बालिका है, तेरे विवाह का समय अभी दूर है और अतुलनीय प्रभाववाले देवता भी तुझे चाहते हैं ॥१९१॥