कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ लम्बक ७५१ तब व्यर्थ अपशब्द का प्रयोग करते हुए उस साधु ने उस किसान पर शाप किया। यह देखकर वह किसान गाना बन्द करके संन्यासी से कहने लगा ॥३३॥ 'आश्चर्य है कि तुम संन्यासी हो धर्म को नहीं जानते और मूर्ख होकर भी मैंने धर्म का सार जान लिया है' ॥३४॥ यह सुनकर साधु कौतुक से बोला—'तुमने क्या जाना ?' उत्तर देते हुए किसान ने कहा—'यहाँ छाया में बैठो और सुनो। मैं तुम्हें बताता हूँ इस प्रदेश में तीन ब्राह्मण भाई थे।—ब्रह्मदत्त सोमदत्त और पुण्यात्मा विष्णुदत्त। उनमें दो बड़े विवाहित थे और तीसरा अविवाहित था ॥३५-३७॥ वह तीसरा छोटा भाई राजाओं के समान दोनों बड़े भाइयों का काम नौकरों के समान करता था। मैं उन्हीं ग्रामों का किसान हूँ ॥३८॥ अत्यन्त मृदु, सीधे-सादे सन्मार्गगामी सरल-हृदय और दम्भ-रहित उस छोटे भाई को वे दोनों बड़े भाई मूर्ख और बुद्धिहीन समझते थे ॥३९॥ एक बार, उसकी दोनों बड़ी भाभियां उस पर आसक्त हो गईं और उन्होंने उससे प्रार्थना की किन्तु छोटे भाई विष्णुदत्त ने उन्हें माता के समान समझते हुए छोड़ दिया ॥४० ॥ तब उन दोनों ने अपने पतियों के पास जाकर मिथ्या भाषण करते हुए कहा कि 'तुम दोनों का छोटा भाई हमलोगों को एकान्त में चाहता है' ॥४१॥ यह सुनकर वे दोनों बड़े भाई, छोटे भाई के प्रति मन-ही-मन जल-भुन गये। सच है दुष्ट स्त्री के वचन से मोहित व्यक्ति सच और झूठ पर विचार नहीं करते ॥४२॥ एक बार वे दोनों भाई विष्णुदत्त से बोले—'तुम जाओ। खेत के बीच वल्मीक (बाँबी) को खोदकर बराबर करो' ॥४३॥ 'अच्छा' कहकर वह जाकर हथियार से मिट्टी के ढेर को बराबर करने लगा तो मैंने उसे रोका कि 'इसमें काला साँप है' ॥४४॥ यह सुनकर भी वह काटने से न हटा क्योंकि वह उन पापी बड़े भाइयों की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करना चाहता था ॥४५॥ खोदे जाते हुए वल्मीक से उसने सोने के मुक्ताहारों से भरा हुआ घड़ा प्राप्त किया। किन्तु काला साँप नहीं मिला क्योंकि धर्म सद्व्यक्तियों का साथ देता है ॥४६॥ मेरे रोकने पर भी उसने गहरी भक्ति (प्रेम) के कारण उस घड़े को ले जाकर बड़े भाइयों को सौंप दिया ॥४७॥