कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ लम्बक ४५५ उन्मादिनी और राजा देवसेन की कथा प्राचीन काल में राजा देवसेन के राष्ट्र में समस्त संसार को उन्मत्त बनाने वाली उन्मादिनी नाम की एक वैश्य-कन्या थी ॥६२॥ उसके पिता की प्रार्थना पर भी राजा ने ब्राह्मणों के उसे कुलक्षणा बताने के कारण ग्रहण नहीं किया ॥६३॥ उस कन्या को राजा के प्रधान मन्त्री ने ब्याह लिया। किसी समय उन्मादिनी ने खिड़की से अपना स्वरूप राजा को दिखा दिया। उसकी दृष्टि के विष से राजा बार-बार मूर्च्छित होने लगा और उसका मन भोजन पान तथा शयन आदि किसी कार्य में नहीं लगा ॥६४-६५॥ तदनन्तर उन्मादिनी के पति प्रधान-मन्त्री द्वारा राजा से उसे ग्रहण करने की प्रार्थना किए जाने पर भी राजा ने धार्मिक प्रवृत्ति के कारण उसे स्वीकार न किया और उसकी आसक्ति में अपने प्राण दे दिये ॥६६॥ इस प्रकार के प्रमाद के यहाँ होने पर स्वामी-द्रोह हो सकता है, यही सोचकर यह आश्चर्य मैंने आपसे कह दिया ॥६७॥ वह राजा श्रुतसेन कामदेव की आज्ञा के समान उस ब्राह्मण से यह वृत्तान्त सुनकर विद्युत्प्रभा पर हृदय से आसक्त हो गया ॥६८॥ तदनन्तर उस राजा ने उसी क्षण ब्राह्मण को विदा करके ऐसा प्रबन्ध किया कि विद्युत्प्रभा से उसका विवाह हो गया। विवाह हो जाने पर वह राजपुत्री विद्युत्प्रभा राजा श्रुतसेन से उसी प्रकार अभिन्न थी जैसे सूर्य की प्रभा सूर्य से अभिन्न होती है ॥६९-७०॥ कुछ समय के पश्चात् राजा श्रुतसेन के पास किसी महाधनी वैश्य की रूपगर्विता कन्या भानुदत्ता स्वयंवर के लिए आई ॥७१॥ अधर्म के भय से राजा ने वैश्यकन्या को ग्रहण कर लिया। यह जानकर राजा की पहली रानी विद्युत्प्रभा का हृदय विदीर्ण हो गया और वह मर गई ॥७२॥ राजा ने आकर जब अपनी पहली रानी को मरा हुआ देखा तब उसने उसे अपनी गोद में रख लिया और शोक में रीता हुआ वह भी उसी क्षण मर गया। उसके बाद वैश्य कन्या भानुदत्ता भी आग में कूद कर जल मरी। इस प्रकार, सारे राज्य का ही सत्यानाश हो गया ॥७३-७४॥ इसलिए महाराज उच्चकोटि के गहरे प्रेम जानकर मानिनी रानी वासवदत्ता के प्रेम का भंग अत्यन्त कष्टप्रद है ॥७५॥