भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

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षष्ठ स्तबक ७६१ इस विषय में कोई उदाहरण है तो मुझे बताइए। मोयोद्धर के इस प्रकार कहने पर दीप्तप्रसन्न ने कहा—'मित्र इसका उदाहरण है। सुनो इस विषय की एक कथा कहता हूँ॥१५॥

उल्लू, नेवला, बिल्ली और चूहे की कथा

प्राचीन समय में विदिशा नगरी के बाहर बहुत विशाल एक वटवृक्ष था॥१६॥ उस वृक्ष में नेवला, उल्लू, बिल्ली और चूहा ये चार प्राणी अपना पृथक्-पृथक् स्थान बनाकर रहते थे। वृक्ष की जड़ में पृथक्-पृथक् बिलों में चूहा और नेवला रहा करते तथा बिल्ली वृक्ष के बीच के एक कोटर (खोलसे) में और उल्लू सबसे ऊपर लता से घिरी हुई डाली में रहता था जहाँ किसी की पहुँच न थी। इनमें चूहा तीनों के लिए बध्य था और शेष तीनों बिल्ली के लिए बध्य थे॥१७-१९॥

उनमें चूहा और नेवला बिल्ली से भयभीत होकर अन्न के लिए तथा उल्लू स्वभाव से भोजन के लिए, ये तीनों ही रात में घूमा करते थे॥११॥ और बिल्ली निर्भय होकर दिन-रात चूहे की खोज में जौ के खेत में चक्कर लगाया करती थी॥१२१॥

एक बार जबकि भोजन की खोज में वन्य जानवर भी इधर-उधर गये हुए थे तब इसी पर वहाँ एक बहेलिया चांडाल आ गया॥१२२॥ वह वहाँ पर बिलाव (बिल्ली) के पैरों के चिह्नों को खेत की ओर जाते देखकर, खेत में चारों ओर जाल बाँधकर चला गया॥११३॥ उस खेत में रात को बिलाव चूहे को मारने की इच्छा से घुसा और वहीं वह जाल में फँस गया॥११४॥ अन्न खाने के लालच से धीरे-धीरे और चुपचाप चूहा भी उस खेत में आया और वहाँ बिलाव को बँधा देखकर प्रसन्न होकर नाचने लगा॥११५॥ जब चूहा एक मार्ग से उस खेत में घुसा तभी नेवला और उल्लू भी दूसरे मार्ग से उसी स्थान पर आ गये॥११६॥ बिलाव को बँधा देखकर वे दोनों चूहे को ढूंढने लगे। चूहा दूर से ही उनकी गतिविधि को देखकर घबराकर सोचने लगा—॥११७॥ 'यदि मैं नेवले और उल्लू को भय देनेवाला बिलाव का आश्रय (शरण) लूँ तो जाल में बँधा हुआ भी यह शत्रु मुझे एक ही प्रहार में मार देगा॥११८॥ ९६